Thursday, January 11, 2018

हिस्ट्री ऑफ़ द फ्यूचर (भविष्य का इतिहास)



बात 2022 ईस्वी की है, भारत की समूची आम जनता फेसबुक पर आ चुकी थी। सभी महत्वपूर्ण निर्णय यहीं लिये जाते थे, सब अपने विचार यहीं व्यक्त करते थे, शादी-ब्याह से लेकर स्टार्ट-अप तक सब यहीं से स्फुटित होते थे, अगड़े-दलित का निर्धारण भी पोस्ट की लाइक-कमेंट-शेयर-व्यू के आधार पर होता था। हमारे अग्रज दलित जिग्नेश-कन्हैया-खा^लीद के आंदोलनों के दिन लद चुके थे। अब किरान्ति यहीं पर होती थी हम फेसबुकिया दलितों द्वारा मठाधीशों के विरुद्ध। हमारी पोस्टों पर 15 और उनके 3-3 हज़ार लाइक क्यों? यह शोषण बंद होना चाहिये यही हमारी माँग थी, सरकार ने इस ओर ध्यान देते हुये ट्यूनिशिया/किर्गिस्तान की स्वयंसेवी संस्थाओं से करार करके लाइक-कमेंट-शेयर का एक कॉर्पस बनाया था परन्तु वह नाकाफ़ी साबित हो रहा था। 

बचपन से लाइमलाइट में आने की सुसुप्त आकांक्षा पालने वाले मुझ जैसे नेता इस आपदा को यूँ ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता था, आख़िरकार साम्यवाद की हमारी मातृशाखा ने यही तो सिखाया था कि असंतोष ही आंदोलन की जननी है। फेसबुक पर 15-20 लाइक पानेवाली हमारी जमात 77 प्रतिशत की थी और मठाधीश मात्र 3 प्रतिशत, सरकार की मज़बूरी थी हमारा तुष्टिकरण करना। ट्यूनिशिया/किर्गिस्तान वाले सरकारी सहायता से भी हमारी परिस्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ क्यूँकि 77% की इस आबादी में ऊँट के मुँह में ज़ीरा से अधिक कुछ नहीं होता था। कोई सुधार होता ना देख हमने स्वयं को फेसबुक का मूलनिवासी और मठाधीशों को सेन्ट्रल ऑरकुट एशिया से आया हुआ आक्रांता बताने का मुहिम चलाया। अब हमारी हर पोस्ट में मठाधीशों को ऑरकुट, याहू चैट रूम और रैडिफ चैट पर भेजने का नारा होता था। हम अपनी माँगों को लेकर दिन-रात लगे रहते थे और इधर मठाधीशों के दिन-दूने रात-चौगुने पाठक बढ़ते जाते थे। प्रोफाइल रिपोर्ट करने का अस्त्र भी काम नहीं आ रहा था। इधर 77% भी एकजुट कहाँ रहते थे, अच्छी पोस्ट देखी नहीं कि जीभ लपलपाते हुये लाइक-कमेंट करने अगड़ों की पोस्ट पर चले जाते। 


ऊपर वर्णित दलित और मठाधीशों के सिवाय एक और प्रजाति एंजेल प्रियाओं की थी जो अपने "गुड मॉर्निंग" और "कैसी लग रही हूँ" की फोटो पर 47000 लाइक और 8000 लंगोटढ़िल्लों का सन्देश पाती थी। किरान्ति को कभी इनसे कोई खतरा नहीं महसूस हुआ हालांकि अंदरखाने हमारे  77% के गुच्छे में फूट पड़ने लगी थी कि उन्हें मठाधीशों का डर दिखाकर गुमराह किया जा रहा है। पोस्ट की औकात होगी तो लोग स्वयं पढ़ेंगे, सरकारी लाइक क्यों लें और एंजेल प्रियाओं और "देख मत पगली,प्यार हो जायेगा" जैसे छछुंदरों के खिलाफ तो कोई नहीं बोलता। अपना जनाधार खिसकता देख मैंने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, अपनी गैंग को ग्रुप चैट पर बुलाकर भावुक माहौल बनाया और बताया - "आज तुमलोगों मेरी बात पसंद नहीं आती... तुम समझते हो कि फेसबुक मूलनिवासी आंदोलन बेमानी है और अगड़े मठाधीशों को गुणवत्ता के कारण लाइक-शेयर मिलते हैं.... तुमलोग बच्चे हो, हमारा यह शोषण हजारों सालों  से चलता आ रहा है और आज विरोध नहीं किया तो मनुवादी मठाधीश ऐसे ही करते रहेंगे। ऑरकुट के दिनों में जब हम टेस्टीमोनी के लिये मिन्नत करते थे तब भी ये ज्ञान बाँचकर बाजी मार लेते थे, जब हम गिल्ली-डंडा खेलते थे तब यही अगड़े फर्स्ट डिवीज़न लाते थे, जब हमारे दलित पूर्वज साल की एक फसल उगाकर सुस्ताते थे तब यही अगड़े ३ फसल निकालकर अपनी जागीर बढ़ाते थे, जब हमारे पूर्वज अल्प-संतोषी होकर खाने लायक उगाते थे तब ये अगड़े खेती योग्य जमीन बढ़ाने के लिये काम करते थे। अब और नहीं, फेसबुक से इन्हें भागना ही होगा यह हमारा राज चलेगा।" जे बीम-जे बीम के नारों से पूरा ग्रुप गुंजायमान हो रहा था।  

2025 आते-आते मनुवादी अगड़े फेसबुक छोड़कर जाने लगे थे क्यूँकि अब यहाँ ज्ञान कम, कचरा अधिक दिखता था और रोज-रोज की ID रिपोर्टिंग से भी वे परेशान हो चले थे। उनके ज्ञान का नया ठिकाना बना Quora.  मेरे अग्रज दलित नेताओं की किरांति माफ़िक मेरी भी तेल लेने गयी। अब 2029 है और Quora पर भी देख रहा हूँ अपनी माँगों के साथ नये दलित नेता उभर रहे हैं.... वही पुरानी वाली--- "Quora के मूलनिवासी हम हैं, मनुवादी अगड़े सेंट्रल फेसबुक एशिया से आये हैं। इनको भगाओ, Quora पर उत्तर हम देंगे।"

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