Monday, February 7, 2011

एक अधूरी कहानी

मित्रों,
अब भ्रष्टाचार के विषय पर नहीं लिखूंगा। सत्ता में बैठे लोग चिढाते हैं, सतर्कता आयोग वाले भी बोलते हैं - भ्रष्टाचार यथार्थ है, इसके साथ जीना सीखो। देशवासियों की सहूलियत के लिए हमारी सरकार ने CVC भी दागी ही चुना है।
एक सच्चाई यह भी है कि सबने समझौता कर लिया है हालात से, मैं क्यूँ सिर फोडूं अपना ।
और वैसे घोटालों की growth story भी तो exponential है -गुणात्मक भी और मात्रात्मक भी। पृथ्वी (आदर्श सोसायटी) , अग्नि -जल (सुखाड़ -बाढ़ राहत कोष की लूट) , आकाश (स्पेक्ट्रम, S-band) --सबके घोटाले हमारे पास।

वो कहते हैं ना कुत्ते की दूम सीधी नहीं होती- सोचा था कुछ हलके फुल्के विषय पर लिखूंगा ताकि आप चाय - बिस्कुट के साथ पढ़ें और थोडा गुद्गुदाएं , भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।

दो दशक पहले का वाकया है, तब हमारे कस्बे से प्रवासी भारतीय श्रेणी में कोई परिवार नहीं आता था। हाँ मेरे कस्बे को केंद्र मानकर २५ किलोमीटर की त्रिज्या वाले वृत्त में कुछ विशिष्ट परिवार अवश्य थे और समूचे क्षेत्र के लोग उनसे अपनी निकटता के दावे पेश करते थे। लेकिन इन गणमान्य सज्जनों के दर्शन दुर्लभ थे, कम से कम मेरे बचपन नें तो इन्हें अपनी आँखों से नहीं देखा। खैर, जुगाड़ में अव्वल हम ग्रामवासियों ने बम्बई को भी विदेश का दर्ज़ा दे दिया- बम्बई से आये वीरों को ATG (Aarti-Tika-Garland)- स्वागत के लिए योग्य घोषित कर दिया। ऐसे एक सज्जन मेरे पड़ोस में पधारे उनके मामा के घर. मेज़बान महिलाएं ऐसे दिखावे के मौके नहीं गवातीं और सखियों को न्योता भिजवा देती हैं. माँ की ऊँगली थामे जा पहुंचा मैं भी प्रदर्शनी में. मेज़बान की कोशिश तो रहती है बड़े सहज भाव से इन विदेशी पदार्थों को बिखेर कर रखने की ताकि आपकी निगाहें उन पर टिकें और आप जलते रहें. इन सबके पीछे की भावना थोड़ी मिश्रित किस्म की होती है- पहली, मना करने के बावजूद भी ये सब ले आया और दूसरी ये मेरा पुत्र समान भांजा बम्बई का बहुत पैसावाला है, तो मुझे ज्यादा इज्ज़त मिलनी चाहिए, इत्यादि. कहना ना होगा कि उनकी ये चतुराई मेरे single digit उम्र को भी चकमा ना दे सकी. सामान कि सूची में दुर्लभ माना जाने वाला Camera, Perfume कि बोतल, खूबसूरत कपडे वगैरह प्रमुख थे, अटैची पर भी नज़र टिकती थी.मेरे बालमन ने अव्यक्त जिद्द ठान ली कि मुझे भी ऐसा ही सितारा बनकर दिखाना है और इससे भी बड़ी प्रदर्शनी लगानी है. मित्रों, हमारा ये समाज इज्ज़त तौल तौलकर पड़ोसता हैं. जैसे कि जिला मुख्यालय में निवास होने की वज़ह से हमारी थोड़ी इज्ज़त है, परन्तु त्योहारों में बड़े शहरों से कोई आ जाए तो उनकी खातिर अपेक्षाकृत ज्यादा होती है. खैर, दिन-महीने-साल बीते, दशक भी. हमारी कहानी के नायक का लामकाफ भी. हमारे उन पडोसी चाचा के सुपुत्र भी श्रीमान नायक के साथ अंतर्राष्ट्रीय ठप्पे वाले हो गए हैं, बड़ा बंगला, बड़ी गाड़ी, गुणगान करते रिश्तेदार- बोले तो सब चकाचक. और बड़े बंगले में आम लोगों की पूछ कम हो जाती है, सो जनाब हमसे दूर होते गए. इधर मेरी उम्र भी समय से तेज़ भागी, बंगलोर में एक MNC में Software engineer हूँ. विदेश जाने के अवसर तो MNCs में मिलते रहते हैं, किन्ही कारणों से मैं अब तक वंचित हूँ- देश में बैठकर ही अमरीकन की परेशानी सुलझाता हूँ. "Theory of relative" इज्ज़त के अनुसार अब भी मेरे परिवार की इज्ज़त पडोसी चाचा से कम है.
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अमरीका में भारतीय छात्रों के अंगों पर खोजी यंत्र चिपकाने का अमानवीय कृत्य हुआ, मैंने भी बढ़-चढ़कर इसका विरोध दर्ज किया. जब उनके एक अधिकारी ने जले पर नमक छिड़कते हुए इसे cool & trendy बताया तब रहा ना गया,- अमरीका में बसे अपने मित्र को खरी-खोटी सुना दी, उसके भारत-भक्त होने पर भी सवाल खड़े कर दिए, कुछ भावुक उपदेश भी दे डाला. मित्रवर, अपनी हार मानने वालों में से नहीं थे, उनके तर्क और मेरे कुतर्कों की लड़ाई ३ घंटे तक चली. यह बात तो मुझे भी पता थी कि मेरे पास सिर्फ जज़्बात का हथियार था और उनके तरकश में एक से बढ़कर एक ब्रह्मास्त्र. अमरीका को यदि यह स्वीकार्य नहीं कि उसकी धरती पर कोई धोखे से आकर बस जाए नियमों में loophole बनाकर . और deport करने से पहले गतिविधियों पर नज़र रखना चाहे तो एक स्वतंत्र देश होने के नाते उन्हें मेरे या मेरे देश कि आपत्ति को नज़रअंदाज करने का पूरा अधिकार है . वो यदि अपने संसाधनों का १ कतरा भी घुसपैठियों पर न्योछावर नहीं करना चाहते तो इसमें बुरा क्या है,और इन संभावित घुसपैठियों की कोई आपराधिक योजना तो नहीं ये जांचने के लिए sci-fi खिलौने चिपकाना भी जायज़ है. किसी online course के लिए 1700 छात्र एक ही apartment का पता बताकर California के विश्वविद्यालय में जाएं तो दिमाग में घंटी बजती है.और California में पढ़ाई के लिए पंजीकरण करके Boston, New York, इत्यादि जगहों पर part-time job से घंटी दुबारा बजती है.Course completion में जान बूझकर देरी से भी संदेह होता है.अमरीका की सरकार भारत सरकार जैसी दयालु तो है नहीं जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों को दामाद बनाकर रखा जाता, नागरिकता केवल इसलिए दे दी जाती है क्यूंकि ये potential vote bank हो सकते हैं तथाकथित secular पार्टी के. कुछ ८ करोड़ बंगलादेशी तो बिना रोक टोक भारत को सराय बना बैठे हैं. हमारे लिए आतंरिक सुरक्षा कोई मुद्दा नहीं सो हम sci-fi खिलौने भी नहीं चिपकाते. वैसे अमरीका में बसे भारतीयों का बहुसंख्यक समूह "Theory of relative इज्ज़त" के तहत हम देशी लोगों के ह्रदय में विशेष स्थान पाता है. हम इनसे अपनी निकटता सुनाते नहीं थकते. सच्चाई तो ये है कि ऊपर वर्णित छात्र भी इसी समूह में शामिल होने गए थे.
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कुछ बातें छिपाए नहीं छिपती; खोजी प्रवृति के कुछ पड़ोसियों ने ये खबर दे कर सनसनी फैला दी कि पड़ोसी चाचा के पुत्र की बम्बई में गिरफ्तारी हुयी है तस्करी के केस में॥ अब import-export business का मतलब घरेलू नौकरों की समझ में भी आ चूका था. अब प्रश्न यह है की सालों से स्वयं को दूर कर चुके पड़ोसी चाचा के घर जाकर क्या हमें एकजुटता दिखानी चाहिए या नहीं? मसला इतना गंभीर भी नहीं क्यूंकि ऐसे केस जेब ढीली करने से ही बंद हो जाते हैं. और फिर सब कुछ सामान्य हो गया तो हमारी तो दुश्मनी हो जायेगी ना Mr Muscle से.
कहानी अधूरी है-आपके जवाब से पूरी होगी -- जोड़ों पर बंधे GPS यंत्र को fashion statement मान लूं या इसे भारत का अपमान समझकर लड़ता रहूँ.

Thursday, January 20, 2011

हमारी दरिद्रता के कारक




मित्रों,

इन दिनों समाचार-माध्यम बड़ी जिम्मेदारी से अपना काम कर रहे हैं: ढेर सारी खबरें दे जाते हैं।

सुबह आँखें खुलते ही 60 पृष्ठ का Times of India हाथ लगता है (ये बात और है कि कुछ तो पलटने की भी ज़रुरत नहीं होती ) --> Headlines में भी ताजगी होती है ।

शाम को Times Now पर श्रीमान गोस्वामी २ घंटे तक डटे रहते हैं छड़ी लेकर (वैसे पिटाई करते समय थोड़े पक्षपाती हो जाते हैं) सच उगलवाते हैं। वैसे देशहित में चौपाल लगाने वाले ऐसे अनेकानेक महानुभाव हैं। फिर अंतरताने पर हर click के साथ नयी खबरें flash होती ही रहती है।

अब आप जानना चाहेंगे इनके जिम्मेदारीपूर्वक समाचार प्रसारित करने से मुझे इर्ष्य क्यूँ होती है, तो कुछ मुख्य कारण बताता चलूँ:

१) भ्रष्टाचार की तलाश में इनके खोजी कुत्ते इतने फुर्तीले हैं कि मैंने एक घोटाले पर चिटठा शुरू ना किया तबतक ये उससे बड़े कि रिपोर्टिंग कर देते हैं। स्वभाव से तो मैं भी छुद्र हूँ- Blogging में प्रवेश तो धमाकेदार होनी ही चाहिए



२) मैं भी आम आदमी की भांति आदतन भुलक्कड़ , सहनशील, आलसी (आरामप्रिय) और निराशावादी हूँ, अब आप समझ गए होंगे कि मैंने शुरुआत समाचार माध्यमों कि सराहना से क्यूँ की।

बहरहाल जिन समाचारों ने मुझे आज बाध्य किया उन पर तनिक प्रकाश डाल लेने दीजिये-

Peepli Live के Oscar से बाहर होने का समाचार flash हो रहा था व स्विस बैंक में जमा काले धन को वापस लाने की बहस जारी थी......



मेरे प्यारे भारतवर्ष में बेहयाई बेचने का नया फैशन चल निकला है पिछले कुछ वर्षों से।

इस व्यापार में आम आदमी (इस बजट के मुताबिक़ मैं इस श्रेणी में नहीं हूँ) की सरकार के मुखिया समेत अन्य नेताओं के अलावा विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियाँ शामिल हैं । २ साल पहले भारत की झुग्गी-बस्तियों पर आधारित फिल्म Slumdog Millionaire बनाकर चर्चित हुए कुछ अन्यथा अनजान नाम भी इस बेहयाई-बेचो कार्यक्रम का हिस्सा बने। याद दिला दूं कि इस चलचित्र के निर्माता- निर्देशक एक British नागरिक हैं भारत की गरीबी का मखौल बनाने के सिवा इसमें कुछ भी नहीं।

बताने की आवश्यकता नहीं, कि अपने देश में भी इस चलचित्र को अत्यधिक पसंद किया गया, इस तर्क से की विदेशियों का निर्देशन तो देखो: हमारे फिल्मकार सात जनम में ऐसी फिल्में ना बना सकें। फिल्म को Oscar पुरस्कार मिला तथा कलाकारों को सूट एवं विदेश जाने का मौका।



मैं खून के आंसू रोता रहा कि तभी UPA-2 ने अपने लिए 100 दिनों का लक्ष्य बताते हुए घोषणा-वाचन समारोह आयोजित किया और 100 दिन में पूरे देश से झुग्गी-बस्ती हटाने तथा पुनर्वास की बात की।

भाजपा की हार से तो मायूस था, लेकिन इस खबर के बाद एक चहक आ गयी। राहुल G तक को चुनौती दे डाली मन ही मन में - अब देखता हूँ कैसे लाते हो Milliband सरीखे भारत-विरोधियों को झुग्गी- पर्यटन कराने, Danny Boyle जैसे मच्छरों की क्या औकात।



Peepli Live के जरिये Oscar लाने की कवायद शुरू हुयी तो ऐसा लगा जैसे किसी पाठ का पुनाराभ्यास कर रहा हूँ। किसानों का मजदूरी की ओर पलायन, क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या : यह एक करारा तमाचा है हम तथाकथित सभ्य समाज पर जो दंभ भरते हैं अपने तेज़ आर्थिक विकास दर का। यह एक कडवी सच्चाई है उस कृषि मंत्रालय की जानकारी के लिए जहां से किसानों के हित की एक भी खबर ना सुनने को मिली ना कार्यान्वित हुयी।



चंद गद्दारों ने स्विस बैंकों में देश की जनता का पैसा छिपा रखा है, और हमारे ईमानदार प्रधानमन्त्री देश के सर्वोच्च न्यायालय को कहते हैं कि इन चोरों की सूची सार्वजनिक नहीं की जा सकती। ध्यान देने की बात ये है, कि

यह सूची जर्मनी ने भारत सरकार को इस आधार पर दी है की कहीं इनमे टैक्स-चोरी तो नहीं हुयी।



स्विस सरकार का आर्थिक गोपनीयता कानून आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए नहीं है, ख़ास कर आज के समय में जब हर ज़िम्मेदार राष्ट्र आतंकवाद के खिलाफ एकजूट है और ऐसे कानून की आड़ में आतंकी संगठनों की funding होती है। यदि भारत सरकार देश में एक अधिसूचना जारी कर दे जिस व्यक्ति या ट्रस्ट का स्विस खाता है- अपने आय व्यय की जानकारी दें अन्यथा भारत की संसद क़ानून बनाकर उन बैंकों में संचित धन को जनता से चोरी किया गया घोषित कर देगी और अधिग्रहण कर लेगी।

अगले कदम के तौर पर स्विस सरकार पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर पैसा वापस लाने का प्रयास करे, तब संभव है हमारी आने वाली पीढ़ी को Slumdog की शर्मिंदगी ना झेलनी पड़े, किसानों को इतना सम्मान मिले कि Peepli Live का ख़याल भी ना आये।

मैंने यथार्थ के निकट कि बातें तो बताई नहीं--- हमारी सरकार ने स्विस सरकार से भारतीयों के जमा हुए धन को Money Laundering तो क्या Tax-evasion के लिए भी पहल नहीं की। तब भी नहीं जब अमेरिका ने स्विस सरकार और आर्थिक गोपनीयता कानून की कान ऐंठते हुए अपने भ्रष्ट नागरिकों की सूची निकलवाई।
हमारा रवैया तो ऐसा होता है कि हसन अली (एक चेहरा जो स्विट्जर्लैंड के खातों के लेन-देन का जरिया है) जिसने 70,000 करोड़ कि तस्करी का संगीन जुर्म किया, पकडे जाने पर मुकदमा चलता है २ पासपोर्ट रखने का (ये तो हमारे २-G भी रखते हैं).
अप्रत्याशित तो नहीं लगता क्यूँकि जिनको कार्यवाही करनी चाहिए उनके ही तो ये proxy हैं.

मित्रों,
यदि आप इस भ्रम को पाल बैठे हैं कि सरकार ईमानदारीपूर्वक आपके चोरी हुए पैसे को वापस लाकर देगी तो याद दिला दूं, कांग्रेस के दिवंगत मिस्टर फोटोजेनिक के खाते कि लगभग पुष्टि हो चुकी है. तो आप सरकार में बैठे अपने प्रतिनिधियों की मजबूरी समझिये.


आपका पैसा है तो लाने की जुगत तो आपको ही करनी होगी: मेरा काम तो जागना और जगाना है.
भुलक्कड़पन का रोग लगा है तो ये डकैत फिर लूटेंगे, फिर सत्ता पर कब्ज़ा जमायेंगे और हसेंगे आपकी गरीबी पर, चलचित्र बनायेंगे माँ भारती की दरिद्र अवस्था पर, अपने विदेशी मित्रों को झुग्गी- पर्यटन करवाएंगे।


अब जागना होगा.

इति (4 :55 AM)