Tuesday, May 12, 2015

राजनीतिक गिद्धों की पूजा--- नरबलि

लम्बी छुट्टी के बाद आज पुनः आपसे मुखातिब हूँ।  कल बातों-बातों में पिताजी ने पूछा---- "गजेन्द्र सिंह की 'आत्म'हत्या वाले मुद्दे पर आपने कुछ लिखा?" अचानक पूछे गए सवालों से मुझे हमेशा से ही सकपकाहट होती है, परन्तु चूँकि सवाल पिताश्री का था तो तुरंत संभलते हुए जवाब दिया--- "पिताजी, इस प्रकरण में कुछ भी लिखना दिवंगत आत्मा के प्रति अनादर होगा .... और फिर इस मुद्दे में कोई दम नहीं और बात पुरानी हो चली है .... मेरे अधिकांश मित्र असलियत जानते हैं केजरीवाल की कार्यप्रणाली"। पिताजी के आदेश के पीछे कोई बात रही होगी और मैं इसी आलोक में घटना का एक पक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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बिहार के उत्तरी जिलों में काम-काज की रफ़्तार किसी से छुपी नहीं। जितनी धीमी काम की रफ़्तार उतनी ही तर्रार जुबानी शेखी। इलाके की ज्यादातर आबादी गप्पों में ही जीवन बिताती मिलेंगी। जी हाँ, आदि-शंकराचार्य को निरुत्तर कर देने वालों की धरती पर गप्पाड़ों का जमावड़ा है। अब ना तो मेहनतकश किसान, ना ही कीर्तन। सब पैसा हड़पने में जुटे हैं और जो अर्थहीन है वह भाग्यवाद का पंडित।

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15 अगस्त 1947 को कुछ लोग विभाजन और अधिकांश लोग आजादी के दिन के रूप में मनाते हैं …… असली लॉटरी तो लगी उन दोपाया प्राणियों की जिनका जन्म 1942 के पहले हो गया था और तुष्टिकरण की सरकारी नीतियों ने थोक भाव से स्वतंत्रता सेनानी करार दिया। मुफ्त की रेल यात्रा, आजीवन पेंशन इत्यादि का छककर मजा लूटा ऐसे बाबाओं ने जिन्होंने ना तो अंग्रेजों पर 1 ढेला चलाया और ना ही इन्हें किसी अँगरेज़ ने 1 थप्पड़ मारा। बहुत से फर्जी स्वतंत्रता सेनानी अव्वल दर्ज़े के फ़ूहड़ और कइयों ने तो उम्र 15-20 साल बढ़ाकर बताया सुविधाएं डकरने को।
शहर वाले स्वतंत्रता सेनानियों को जितना सम्मान देते हैं, गाँवों में ऐसा नहीं है---- जैसे बुड्ढे, वैसा मान। गंभीर बाबाओं से डरना और हलके  बुड्ढों की खिंचाई। मेरे गृह-जिले के एक गाँव को  पड़ोसी गाँव से एक बरसाती नदी अलग  करती है। आजादी के पहले से पुल की माँग भी थी और दरकार भी। कई दुर्घटनाएँ घटीं ग्रामीणों के साथ नदी पार करते, पर सरकारी बाबूओं की फाइलों में ग्रामीण प्राणों की कोई  कीमत नहीं होती। गाँव में लम्पटों की एक टोली  उपरोक्त श्रेणी के एक बाबा के मजे ले रहा था। "टीवीवाली, अखबारवाली  रहेगा … DM, SP सब रहेगा। आपको कुछ नहीं करना है---- मटिया तेल(*किरोसिन)  डालना है। परशासन अइसे नहीं मानेगा। माचिस जलाते ही हम आपको धर लेंगे। सरकार हिल जायेगा बाबा ……"
इसके बाद जो हुआ वह इतिहास के पन्नों में है। वंशी साह ने तीली जलाई, गाँव के लौंडे फुर्र और चाचा धूं-धूं कर जलने लगे, मिनट में स्वाहा। सिपाही देखते रहे, छोटे-मोटे पत्रकार और ग्रामीण तमाशे के संवेदनहीन मूकदर्शक भी थे और स्क्रिप्टराइटर भी।
कालांतर में "वंशी चाचा के संघर्ष" को ध्यान में रखते हुये पुल का नामाकरण चाचाजी के नाम पर हो गया। ऐसी कहानियाँ हमने बचपन में भी पढ़ी थी--- "अखबार में नाम" .…
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गजेन्द्र सिंह की कहानी अलग थी, भरा-पूरा समृद्ध परिवार। राजनीति के गिद्धों ने उसके महत्वाकांक्षा की बलि ले ली। जितना मनोविज्ञान मुझे पता है, पेड़ पर चढ़े गजेन्द्र के हाव-भाव मृत्युसूचक तो नहीं थे। परिवार के उत्सव और प्यारी सी बिटिया को छोड़कर 400 किलोमीटर की यात्रा आत्महत्या के लिये, वह भी इतने लोगों के बीच, पार्टी का चुनाव चिह्न हाथ में लेकर ----- ना, ना .... गजेन्द्रजी, आपका गणित गलत हो गया। जैसे वंशी चाचा आग के लपटों की रफ़्तार का अंदाज़ा ना लगा सके, आप भी सूती साफ़े की गाँठ और गले की कोमलता ना भाँप सके। तिसपर आपने उन गिद्धों से अपेक्षा रखी कि वे बचाने को आगे आयेंगे जिनका राजनीतिक आहार ही नरबलि है।

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(मृतक के परिवार के साथ मेरी संवेदनाएँ हैं। पोस्ट उनको आहत करने नहीं लिखी है।)