स्टोरीटाइम--
कक्षा 9 की बात है, सरकारी विद्यालय की पढ़ाई नाकाफ़ी साबित होती देख पिताश्री ने अपने एक मित्र की कोचिंग सेंटर में 2 घंटे की क्लास लगवा दी। 10वीं की बोर्ड का मामला था, फेल होना मतलब बिरादरी में नाक कटना। बॉयज हाईस्कूल से अलग माहौल था। कहाँ तो बॉयज स्कूल से लंपटों की टोली कक्षा से भागकर कन्या उच्च विद्यालय के चक्कर काटने जाती थी और यहाँ एक ही कक्षा में आस-पास बैठकर मास्टरजी को 'सुनते' थे। मास्टरजी लोग भी बेरोजगारी के मारे युवा थे। कुछ पाजी किस्म के छोरों ने मास्टरजी के कमरे में जासूसी करके "ललितरस" की सामग्रियाँ जुटा ली। कुल मिलाकर मेरे अंदर की सोयी हुयी आशिकी मूर्तरूप लेने लगी।
खैर, हमउम्र पड़ोसी को झरोखे से झाँकने के आगे नहीं बढ़ पाये हम। किशोरावस्था की सारी कहानियाँ जिनका मैं नायक था, सपनों में ही बुनी गयीं और दम तोड़ती चली गयीं। किसी मुर्ख ने सिद्धान्त दे रखा है कि "सच्चा प्रेम" एक बार ही होता है। बकवास... कोरा बकवास.... बार-बार होता है...सीधी भाषा में प्यार मतलब अच्छा लगना... क्षणिक भी हो सकता है और स्थायी भी। जयप्रकाश बाबू और प्रभावती देवी जैसा भी हो सकता है और नेहरू-एडविना जैसा भी। अपने खाते में भी अनेकों क्षणिक और कुछ स्थायी प्रेम कहानियाँ हैं।
IT की नौकरी में भावनाओं को वश में रखना सीखना होता है, सो मैंने सीखा। नैन मटक्के की एक गलत रीडिंग आपको परेशानी में डाल सकती है। इंटर्नशिप के लिये हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स कर रहे युवतियों की टोली पधारी। इनमें से अधिकांश ने डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के बाद यह कोर्स चुना था। सामान्य सी दिखनेवाली एक लड़की अलग-थलग सी रहती थी, अकेलेपन को छुपाने और ध्यान बटोरने के लिये चढ़ी रहती थी रीडिंग ग्लास और खुले हुये पन्ने। मेरे प्यार की दुकान तो एकांतवासिनियों और उपन्यास पढ़नेवालों के लिये हमेशा खुली रहती हैं, सो बत्ती जल गयी। पता था कि गलत सिग्नलिंग से दुर्घटना घटेगी, सो कनखियों तक ही सीमित रही अपनी कहानी।
मुफ़्त की दारु भकोसने को कॉर्पोरेट जगत में टीम बिल्डिंग कहते हैं। हम दोनों चश्माधारी जंतु भी मौजूद थे लेकिन मोबाइल फोन में निगाहें टिकाकर स्वयं को व्यस्त साबित करने पर तुले थे। हालात ने भी हमारे इस नीरस कृत्य से झुँझलाकर ललित रस की याद दिलाने हेतु टीम बिल्डिंग इवेंट के मुख्य आकर्षण zorb बॉल में हम दोनों को ढ़केल दिया। हामी दोनों की थी। तथाकथित अबलाओं को मिली अतिरिक्त स्पर्श इन्द्रिय ने त्वरित ईशारा भेजा---- 10 सेकंड की मुफ़्त ज़ोर्बिंग से कुछ और की उम्मीद मत लगाओ। समय और बटुआ ढ़ीला करना होगा। अपने पास दोनों की कमी है, सो मैंने प्यार के कपाट बंद किये। इति...
कंप्यूटर स्क्रीन की तरफ टकटकी लगाये कभी-कभी मैं कल्पना-जगत में भी होता हूँ। स्मशान की भाँति शाँत मन को कंप्यूटर स्क्रीन पर अघोड़ी की तरह टपके एक मेसेज ने छेड़ा। बंद पड़े प्यार के कारखाने में आज हलचल हुयी। विशुद्ध हिंदी क्षेत्र से होने और मुझे भी उसी अंचल का जानने के बावजूद उनकी अंग्रेज़ी बदस्तूर जारी रही। हमने भी अपनी बात को अनुवाद करके चिपकाया। पूछ डाला, कैसी कहानियाँ पसंद हैं और उत्तर था नवसिखुआ छाप। दो मीठे बोल और मैंने प्रकाशन के अपने सपने उड़ेल दिये। शुक्रवार का दिन था और काम का बोझ कम।
स्क्रीन पर चमका---- "Insha Allah"...
मुझे समझ नहीं आया कि अंग्रेजी में चल रही बातचीत में अरबी कहाँ से घुस आयी। मैंने लिखा---
"What does that mean"..
मोहतरमा ने मेरे अज्ञान के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुये बताया इसका अर्थ और फिर 2 मिनट का सन्नाटा(शायद मेरी फेसबुक प्रोफाइल खंगालने गयी थीं)।
"Are U RSS type or something"...
कहाँ तो मैं सोच रहा था कि उसके गृहजिले के हालिये दंगे की चर्चा करूँगा, हालात समझूँगा.... यहाँ तो मुझे Humanity पर व्याख्यान मिलने लगा। यथोचित उत्तर देते हुये मैंने लम्बी चर्चा को पूर्णविराम दिया।
पूरी रात करवटें बदलते बीती और सुबह धर्मपत्नी निक्कर पर इस्त्री चलाती दिखी ताकि उसका पति कुछ बच्चों को इकट्ठा करके कबड्डी खेलने जाये। क्षणिक और स्थायी प्यार का अंतर इस 1 दृश्य ने समझा दिया।
कक्षा 9 की बात है, सरकारी विद्यालय की पढ़ाई नाकाफ़ी साबित होती देख पिताश्री ने अपने एक मित्र की कोचिंग सेंटर में 2 घंटे की क्लास लगवा दी। 10वीं की बोर्ड का मामला था, फेल होना मतलब बिरादरी में नाक कटना। बॉयज हाईस्कूल से अलग माहौल था। कहाँ तो बॉयज स्कूल से लंपटों की टोली कक्षा से भागकर कन्या उच्च विद्यालय के चक्कर काटने जाती थी और यहाँ एक ही कक्षा में आस-पास बैठकर मास्टरजी को 'सुनते' थे। मास्टरजी लोग भी बेरोजगारी के मारे युवा थे। कुछ पाजी किस्म के छोरों ने मास्टरजी के कमरे में जासूसी करके "ललितरस" की सामग्रियाँ जुटा ली। कुल मिलाकर मेरे अंदर की सोयी हुयी आशिकी मूर्तरूप लेने लगी।
खैर, हमउम्र पड़ोसी को झरोखे से झाँकने के आगे नहीं बढ़ पाये हम। किशोरावस्था की सारी कहानियाँ जिनका मैं नायक था, सपनों में ही बुनी गयीं और दम तोड़ती चली गयीं। किसी मुर्ख ने सिद्धान्त दे रखा है कि "सच्चा प्रेम" एक बार ही होता है। बकवास... कोरा बकवास.... बार-बार होता है...सीधी भाषा में प्यार मतलब अच्छा लगना... क्षणिक भी हो सकता है और स्थायी भी। जयप्रकाश बाबू और प्रभावती देवी जैसा भी हो सकता है और नेहरू-एडविना जैसा भी। अपने खाते में भी अनेकों क्षणिक और कुछ स्थायी प्रेम कहानियाँ हैं।
IT की नौकरी में भावनाओं को वश में रखना सीखना होता है, सो मैंने सीखा। नैन मटक्के की एक गलत रीडिंग आपको परेशानी में डाल सकती है। इंटर्नशिप के लिये हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स कर रहे युवतियों की टोली पधारी। इनमें से अधिकांश ने डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के बाद यह कोर्स चुना था। सामान्य सी दिखनेवाली एक लड़की अलग-थलग सी रहती थी, अकेलेपन को छुपाने और ध्यान बटोरने के लिये चढ़ी रहती थी रीडिंग ग्लास और खुले हुये पन्ने। मेरे प्यार की दुकान तो एकांतवासिनियों और उपन्यास पढ़नेवालों के लिये हमेशा खुली रहती हैं, सो बत्ती जल गयी। पता था कि गलत सिग्नलिंग से दुर्घटना घटेगी, सो कनखियों तक ही सीमित रही अपनी कहानी।
मुफ़्त की दारु भकोसने को कॉर्पोरेट जगत में टीम बिल्डिंग कहते हैं। हम दोनों चश्माधारी जंतु भी मौजूद थे लेकिन मोबाइल फोन में निगाहें टिकाकर स्वयं को व्यस्त साबित करने पर तुले थे। हालात ने भी हमारे इस नीरस कृत्य से झुँझलाकर ललित रस की याद दिलाने हेतु टीम बिल्डिंग इवेंट के मुख्य आकर्षण zorb बॉल में हम दोनों को ढ़केल दिया। हामी दोनों की थी। तथाकथित अबलाओं को मिली अतिरिक्त स्पर्श इन्द्रिय ने त्वरित ईशारा भेजा---- 10 सेकंड की मुफ़्त ज़ोर्बिंग से कुछ और की उम्मीद मत लगाओ। समय और बटुआ ढ़ीला करना होगा। अपने पास दोनों की कमी है, सो मैंने प्यार के कपाट बंद किये। इति...
कंप्यूटर स्क्रीन की तरफ टकटकी लगाये कभी-कभी मैं कल्पना-जगत में भी होता हूँ। स्मशान की भाँति शाँत मन को कंप्यूटर स्क्रीन पर अघोड़ी की तरह टपके एक मेसेज ने छेड़ा। बंद पड़े प्यार के कारखाने में आज हलचल हुयी। विशुद्ध हिंदी क्षेत्र से होने और मुझे भी उसी अंचल का जानने के बावजूद उनकी अंग्रेज़ी बदस्तूर जारी रही। हमने भी अपनी बात को अनुवाद करके चिपकाया। पूछ डाला, कैसी कहानियाँ पसंद हैं और उत्तर था नवसिखुआ छाप। दो मीठे बोल और मैंने प्रकाशन के अपने सपने उड़ेल दिये। शुक्रवार का दिन था और काम का बोझ कम।
स्क्रीन पर चमका---- "Insha Allah"...
मुझे समझ नहीं आया कि अंग्रेजी में चल रही बातचीत में अरबी कहाँ से घुस आयी। मैंने लिखा---
"What does that mean"..
मोहतरमा ने मेरे अज्ञान के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुये बताया इसका अर्थ और फिर 2 मिनट का सन्नाटा(शायद मेरी फेसबुक प्रोफाइल खंगालने गयी थीं)।
"Are U RSS type or something"...
कहाँ तो मैं सोच रहा था कि उसके गृहजिले के हालिये दंगे की चर्चा करूँगा, हालात समझूँगा.... यहाँ तो मुझे Humanity पर व्याख्यान मिलने लगा। यथोचित उत्तर देते हुये मैंने लम्बी चर्चा को पूर्णविराम दिया।
पूरी रात करवटें बदलते बीती और सुबह धर्मपत्नी निक्कर पर इस्त्री चलाती दिखी ताकि उसका पति कुछ बच्चों को इकट्ठा करके कबड्डी खेलने जाये। क्षणिक और स्थायी प्यार का अंतर इस 1 दृश्य ने समझा दिया।