Friday, October 23, 2015

स्टोरीटाइम--
कक्षा 9 की बात है, सरकारी विद्यालय की पढ़ाई नाकाफ़ी साबित होती देख पिताश्री ने अपने एक मित्र की कोचिंग सेंटर में 2 घंटे की क्लास लगवा दी। 10वीं की बोर्ड का मामला था, फेल होना मतलब बिरादरी में नाक कटना। बॉयज हाईस्कूल से अलग माहौल था। कहाँ तो बॉयज स्कूल से लंपटों की टोली कक्षा से भागकर कन्या उच्च विद्यालय के चक्कर काटने जाती थी और यहाँ एक ही कक्षा में आस-पास बैठकर मास्टरजी को 'सुनते' थे। मास्टरजी लोग भी बेरोजगारी के मारे युवा थे। कुछ पाजी किस्म के छोरों ने मास्टरजी के कमरे में जासूसी करके "ललितरस" की सामग्रियाँ जुटा ली। कुल मिलाकर मेरे अंदर की सोयी हुयी आशिकी मूर्तरूप लेने लगी।
खैर, हमउम्र पड़ोसी को झरोखे से झाँकने के आगे नहीं बढ़ पाये हम। किशोरावस्था की सारी कहानियाँ जिनका मैं नायक था, सपनों में ही बुनी गयीं और दम तोड़ती चली गयीं। किसी मुर्ख ने सिद्धान्त दे रखा है कि "सच्चा प्रेम" एक बार ही होता है। बकवास... कोरा बकवास.... बार-बार होता है...सीधी भाषा में प्यार मतलब अच्छा लगना... क्षणिक भी हो सकता है और स्थायी भी। जयप्रकाश बाबू और प्रभावती देवी जैसा भी हो सकता है और नेहरू-एडविना जैसा भी। अपने खाते में भी अनेकों क्षणिक और कुछ स्थायी प्रेम कहानियाँ हैं।
IT की नौकरी में भावनाओं को वश में रखना सीखना होता है, सो मैंने सीखा। नैन मटक्के की एक गलत रीडिंग आपको परेशानी में डाल सकती है। इंटर्नशिप के लिये हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स कर रहे युवतियों की टोली पधारी। इनमें से अधिकांश ने डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के बाद यह कोर्स चुना था। सामान्य सी दिखनेवाली एक लड़की अलग-थलग सी रहती थी, अकेलेपन को छुपाने और ध्यान बटोरने के लिये चढ़ी रहती थी रीडिंग ग्लास और खुले हुये पन्ने। मेरे प्यार की दुकान तो एकांतवासिनियों और उपन्यास पढ़नेवालों के लिये हमेशा खुली रहती हैं, सो बत्ती जल गयी। पता था कि गलत सिग्नलिंग से दुर्घटना घटेगी, सो कनखियों तक ही सीमित रही अपनी कहानी।
मुफ़्त की दारु भकोसने को कॉर्पोरेट जगत में टीम बिल्डिंग कहते हैं। हम दोनों चश्माधारी जंतु भी मौजूद थे लेकिन मोबाइल फोन में निगाहें टिकाकर स्वयं को व्यस्त साबित करने पर तुले थे। हालात ने भी हमारे इस नीरस कृत्य से झुँझलाकर ललित रस की याद दिलाने हेतु टीम बिल्डिंग इवेंट के मुख्य आकर्षण zorb बॉल में हम दोनों को ढ़केल दिया। हामी दोनों की थी। तथाकथित अबलाओं को मिली अतिरिक्त स्पर्श इन्द्रिय ने त्वरित ईशारा भेजा---- 10 सेकंड की मुफ़्त ज़ोर्बिंग से कुछ और की उम्मीद मत लगाओ। समय और बटुआ ढ़ीला करना होगा। अपने पास दोनों की कमी है, सो मैंने प्यार के कपाट बंद किये। इति...
कंप्यूटर स्क्रीन की तरफ टकटकी लगाये कभी-कभी मैं कल्पना-जगत में भी होता हूँ। स्मशान की भाँति शाँत मन को कंप्यूटर स्क्रीन पर अघोड़ी की तरह टपके एक मेसेज ने छेड़ा। बंद पड़े प्यार के कारखाने में आज हलचल हुयी। विशुद्ध हिंदी क्षेत्र से होने और मुझे भी उसी अंचल का जानने के बावजूद उनकी अंग्रेज़ी बदस्तूर जारी रही। हमने भी अपनी बात को अनुवाद करके चिपकाया। पूछ डाला, कैसी कहानियाँ पसंद हैं और उत्तर था नवसिखुआ छाप। दो मीठे बोल और मैंने प्रकाशन के अपने सपने उड़ेल दिये। शुक्रवार का दिन था और काम का बोझ कम।
स्क्रीन पर चमका---- "Insha Allah"...
मुझे समझ नहीं आया कि अंग्रेजी में चल रही बातचीत में अरबी कहाँ से घुस आयी। मैंने लिखा---
"What does that mean"..
मोहतरमा ने मेरे अज्ञान के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुये बताया इसका अर्थ और फिर 2 मिनट का सन्नाटा(शायद मेरी फेसबुक प्रोफाइल खंगालने गयी थीं)।
"Are U RSS type or something"...
कहाँ तो मैं सोच रहा था कि उसके गृहजिले के हालिये दंगे की चर्चा करूँगा, हालात समझूँगा.... यहाँ तो मुझे Humanity पर व्याख्यान मिलने लगा। यथोचित उत्तर देते हुये मैंने लम्बी चर्चा को पूर्णविराम दिया।
पूरी रात करवटें बदलते बीती और सुबह धर्मपत्नी निक्कर पर इस्त्री चलाती दिखी ताकि उसका पति कुछ बच्चों को इकट्ठा करके कबड्डी खेलने जाये। क्षणिक और स्थायी प्यार का अंतर इस 1 दृश्य ने समझा दिया।

Thursday, October 22, 2015

अमेरिका में 3 तरह के रेडियो स्टेशन होते हैं--- पहला, जिधर गोरे जॉकी फटाफट गपशप करते हैं और अंग्रेज़ी गाने सुनाते हैं(आवाज़ से भी चमड़ी का रंग पता चलता है यहाँ) गपशप में फुटबॉल, मौसम से लेकर राजनैतिक समाचारों पर सरसरी टिप्पणी होती है। इसके श्रोता या तो तन/मन से गोरे होते हैं अथवा उनके क्षेत्र में दूसरे प्रकार के चैनल प्रसारित नहीं होते। इन RJ की वाक्शैली बेहतरीन होती है, गीतों के चुनाव के विषय मुझे कम ज्ञान है।

दूसरे प्रकार के स्टेशन गिनती के हैं और सीमित क्षेत्रों में है जहाँ देसी(भारतीय + पाकिस्तानी) आबादी है। यहाँ उद्घोषक की शैली नकलचीनुमा जान पड़ती है परन्तु इनके अपने श्रोता हैं। मुख्यतया यह एक प्रचार माध्यम है छोटे-बड़े देसी प्रतिष्ठानों का तथा भारतीय भाषाओं के कार्यक्रम होते हैं।

13 नवम्बर '13 को मैं अमेरिका के सुदूरवर्ती राज्य में था जहाँ दूसरी कोटि के चैनल नहीं आते थे... अपने  अकेलेपन से  लड़ने के लिये मैंने रेडियो चलाया और संयोग से 1-2 गाने के बाद ही भारत की खबर चली। मेरी प्रसन्नता टिकाऊ नहीं थी और शीघ्र ही मुझे शर्मिंदा होना था। जॉकी CBI निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा बलात्कार पर दिये गये आपत्तिजनक बयान से भारतीयों की  सोच को जोड़कर माखौल बना रहे थे। भारत की उभरती अर्थव्यवस्था पर ये २ शब्द नहीं बोलते पर भारत को असभ्य-बर्बर बताने का प्रयास सदा चलता रहता है। इसके कारणों की विवेचना पर लम्बा लेख लिखा जा सकता है। हाल ही में हुयी दादरी की घटना पर इन चैनलों ने जमकर टिप्पणियाँ दी, कहना ना होगा बिना समुचित संधान किये। दूसरे प्रकार के चैनल भी अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं थे। 1 जॉकी पूरे सप्ताह केवल यही बोलता रहा--- "आज मैं बीफ खाकर नहीं आया हूँ, इसलिये audience का सिर खाऊँगा। और श्रुति, तुम मुझे मार भी नहीं सकती क्यूँकि Bay Area में Law & Order है।"

भारत में भी कई शर्मनाक घटनाएँ घटीं--- मसलन बेहूदा किस्म की बीफ पार्टी का आयोजन और इसका समर्थन नहीं करने के कारण राहुल ईश्वर पर हमला, लालू यादव द्वारा गोपालक हिन्दू समाज पर भद्दी टिप्पणी, दादरी झगड़े के मुसलमान मृतक को अधिकांश राजनीतिक पार्टियों और मीडिया द्वारा निष्पाप साबित कर मुस्लिम समाज की भावना उकसाना, हिन्दू गौरक्षक के हत्या की उपेक्षा करके हिंदुओं में असंतोष फैलाना।

शोभा डे ने चुनौतीपूर्ण लहज़े में गौमांस खाने की घोषणा की। सवाल यह है कि हम किस स्तर तक गिरेंगे। जिस गाय को आप जानवर समझकर खाने की बात कर रहे हैं और आर्थिक लाभ हेतु तस्करी या निर्यात कर रहे हैं वह ग्रामीण भारत का आधार है। बच्चों के दूध का मुख्य श्रोत, परिवार के आजीविका का साधन भी और बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था भी है। आज एक बड़ी आबादी खेती से भाग कर शहरों में बदतर जीवन जीने को मज़बूर है क्योंकि कृषि में लाभ नहीं दिखता। इसका 1 बड़ा कारण आस्थायुक्त पशुपालन से विमुख होना है। गौधन परिवार का भाग है।

फ्रांस में घोड़े के मांस की माँग है और आपूर्ति के लिये अन्य देशों से आयात करता है। अमेरिका कुछ समय तक अपने देश से भेजा करता था। अभी अश्व वध पर पाबंदी है और इसका आस्था से जुड़ा कोई कारणनहीं। आप में से कुछ मित्र जानते होंगे कि स्पेन से जब 16वीं शताब्दी में बसने के इरादे से लोगों की खेप अमेरिकी तटों पर भेजनी शुरू की गयी तब एक बड़ी चुनौती यातायात के लिये घोड़ों की थी। खाने की समस्या सहजता से हल हो गयी क्यूँकि साथ आये सुवर 10-10 बच्चे देते थे और प्रजनन भी बहुत तेजी से करते थे। कालांतर में स्पेन से घोड़े लाये गये और नयी नस्ल तैयार की गयी … घोड़े गोरों के शान का प्रतीक थे और स्थानीय आबादी को घोड़े चढ़ने की मनाही थी। घोड़ों की संख्या सुवरों के अनुपात में नहीं बढ़ी क्यूँकि वे एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। मस्टंग नस्ल के घोड़े के नाम पर एक आलीशान कार भी है।

बहरहाल, जब स्थानीय रूप से घोड़ों के प्रजनन केंद्र और मंडियाँ सजने लगी तब माँस के लिये  घोड़े काटने लगे(हालाँकि अन्य यूरोपीय देशों की अपेक्षा कम) … एक बात और जानने योग्य है कि घोड़े अब भी कुछ ही राज्यों में हैं। लगभग 1 दशक पहले सरकार ने अश्वमांस पर पाबंदी को उचित समझा और गिनती के पाये जानेवाले कत्लखानों को बंद करवा दिया। इस विषय में विपरीत मत रखनेवालों से सीनेट में चर्चा 10 वर्षों से टाली जा रही है परन्तु कोई इसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाता। ध्यान देने की बात है कि घोड़ों से ना कोई आस्था जुड़ी है इनकी और ना ही अर्थव्यवस्था। सिर्फ और सिर्फ 400 साल पुराना यूरोपीय तार।

गायों से तो हम सबके पूर्वज जुड़े हैं। 17वीं सदी में मेरे पूर्वज जिस गाँव में आ बसे थे वहाँ आज भी परिवार के साथ आयी गौमाता के वंशज  खूँटे पर दीखते हैं। राजा दिलीप की गाय, कपिल मुनि की गाय--- ये कहानियाँ तो हमारा बचपन बनाती हैं।

ना ना शोभाजी, गाय केवल जानवर नहीं है। कम से कम मेरे लिये तो नहीं।