अमेरिका में 3 तरह के रेडियो स्टेशन होते हैं--- पहला, जिधर गोरे जॉकी फटाफट गपशप करते हैं और अंग्रेज़ी गाने सुनाते हैं(आवाज़ से भी चमड़ी का रंग पता चलता है यहाँ) गपशप में फुटबॉल, मौसम से लेकर राजनैतिक समाचारों पर सरसरी टिप्पणी होती है। इसके श्रोता या तो तन/मन से गोरे होते हैं अथवा उनके क्षेत्र में दूसरे प्रकार के चैनल प्रसारित नहीं होते। इन RJ की वाक्शैली बेहतरीन होती है, गीतों के चुनाव के विषय मुझे कम ज्ञान है।
दूसरे प्रकार के स्टेशन गिनती के हैं और सीमित क्षेत्रों में है जहाँ देसी(भारतीय + पाकिस्तानी) आबादी है। यहाँ उद्घोषक की शैली नकलचीनुमा जान पड़ती है परन्तु इनके अपने श्रोता हैं। मुख्यतया यह एक प्रचार माध्यम है छोटे-बड़े देसी प्रतिष्ठानों का तथा भारतीय भाषाओं के कार्यक्रम होते हैं।
13 नवम्बर '13 को मैं अमेरिका के सुदूरवर्ती राज्य में था जहाँ दूसरी कोटि के चैनल नहीं आते थे... अपने अकेलेपन से लड़ने के लिये मैंने रेडियो चलाया और संयोग से 1-2 गाने के बाद ही भारत की खबर चली। मेरी प्रसन्नता टिकाऊ नहीं थी और शीघ्र ही मुझे शर्मिंदा होना था। जॉकी CBI निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा बलात्कार पर दिये गये आपत्तिजनक बयान से भारतीयों की सोच को जोड़कर माखौल बना रहे थे। भारत की उभरती अर्थव्यवस्था पर ये २ शब्द नहीं बोलते पर भारत को असभ्य-बर्बर बताने का प्रयास सदा चलता रहता है। इसके कारणों की विवेचना पर लम्बा लेख लिखा जा सकता है। हाल ही में हुयी दादरी की घटना पर इन चैनलों ने जमकर टिप्पणियाँ दी, कहना ना होगा बिना समुचित संधान किये। दूसरे प्रकार के चैनल भी अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं थे। 1 जॉकी पूरे सप्ताह केवल यही बोलता रहा--- "आज मैं बीफ खाकर नहीं आया हूँ, इसलिये audience का सिर खाऊँगा। और श्रुति, तुम मुझे मार भी नहीं सकती क्यूँकि Bay Area में Law & Order है।"
भारत में भी कई शर्मनाक घटनाएँ घटीं--- मसलन बेहूदा किस्म की बीफ पार्टी का आयोजन और इसका समर्थन नहीं करने के कारण राहुल ईश्वर पर हमला, लालू यादव द्वारा गोपालक हिन्दू समाज पर भद्दी टिप्पणी, दादरी झगड़े के मुसलमान मृतक को अधिकांश राजनीतिक पार्टियों और मीडिया द्वारा निष्पाप साबित कर मुस्लिम समाज की भावना उकसाना, हिन्दू गौरक्षक के हत्या की उपेक्षा करके हिंदुओं में असंतोष फैलाना।
शोभा डे ने चुनौतीपूर्ण लहज़े में गौमांस खाने की घोषणा की। सवाल यह है कि हम किस स्तर तक गिरेंगे। जिस गाय को आप जानवर समझकर खाने की बात कर रहे हैं और आर्थिक लाभ हेतु तस्करी या निर्यात कर रहे हैं वह ग्रामीण भारत का आधार है। बच्चों के दूध का मुख्य श्रोत, परिवार के आजीविका का साधन भी और बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था भी है। आज एक बड़ी आबादी खेती से भाग कर शहरों में बदतर जीवन जीने को मज़बूर है क्योंकि कृषि में लाभ नहीं दिखता। इसका 1 बड़ा कारण आस्थायुक्त पशुपालन से विमुख होना है। गौधन परिवार का भाग है।
फ्रांस में घोड़े के मांस की माँग है और आपूर्ति के लिये अन्य देशों से आयात करता है। अमेरिका कुछ समय तक अपने देश से भेजा करता था। अभी अश्व वध पर पाबंदी है और इसका आस्था से जुड़ा कोई कारणनहीं। आप में से कुछ मित्र जानते होंगे कि स्पेन से जब 16वीं शताब्दी में बसने के इरादे से लोगों की खेप अमेरिकी तटों पर भेजनी शुरू की गयी तब एक बड़ी चुनौती यातायात के लिये घोड़ों की थी। खाने की समस्या सहजता से हल हो गयी क्यूँकि साथ आये सुवर 10-10 बच्चे देते थे और प्रजनन भी बहुत तेजी से करते थे। कालांतर में स्पेन से घोड़े लाये गये और नयी नस्ल तैयार की गयी … घोड़े गोरों के शान का प्रतीक थे और स्थानीय आबादी को घोड़े चढ़ने की मनाही थी। घोड़ों की संख्या सुवरों के अनुपात में नहीं बढ़ी क्यूँकि वे एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। मस्टंग नस्ल के घोड़े के नाम पर एक आलीशान कार भी है।
बहरहाल, जब स्थानीय रूप से घोड़ों के प्रजनन केंद्र और मंडियाँ सजने लगी तब माँस के लिये घोड़े काटने लगे(हालाँकि अन्य यूरोपीय देशों की अपेक्षा कम) … एक बात और जानने योग्य है कि घोड़े अब भी कुछ ही राज्यों में हैं। लगभग 1 दशक पहले सरकार ने अश्वमांस पर पाबंदी को उचित समझा और गिनती के पाये जानेवाले कत्लखानों को बंद करवा दिया। इस विषय में विपरीत मत रखनेवालों से सीनेट में चर्चा 10 वर्षों से टाली जा रही है परन्तु कोई इसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाता। ध्यान देने की बात है कि घोड़ों से ना कोई आस्था जुड़ी है इनकी और ना ही अर्थव्यवस्था। सिर्फ और सिर्फ 400 साल पुराना यूरोपीय तार।
गायों से तो हम सबके पूर्वज जुड़े हैं। 17वीं सदी में मेरे पूर्वज जिस गाँव में आ बसे थे वहाँ आज भी परिवार के साथ आयी गौमाता के वंशज खूँटे पर दीखते हैं। राजा दिलीप की गाय, कपिल मुनि की गाय--- ये कहानियाँ तो हमारा बचपन बनाती हैं।
ना ना शोभाजी, गाय केवल जानवर नहीं है। कम से कम मेरे लिये तो नहीं।
दूसरे प्रकार के स्टेशन गिनती के हैं और सीमित क्षेत्रों में है जहाँ देसी(भारतीय + पाकिस्तानी) आबादी है। यहाँ उद्घोषक की शैली नकलचीनुमा जान पड़ती है परन्तु इनके अपने श्रोता हैं। मुख्यतया यह एक प्रचार माध्यम है छोटे-बड़े देसी प्रतिष्ठानों का तथा भारतीय भाषाओं के कार्यक्रम होते हैं।
13 नवम्बर '13 को मैं अमेरिका के सुदूरवर्ती राज्य में था जहाँ दूसरी कोटि के चैनल नहीं आते थे... अपने अकेलेपन से लड़ने के लिये मैंने रेडियो चलाया और संयोग से 1-2 गाने के बाद ही भारत की खबर चली। मेरी प्रसन्नता टिकाऊ नहीं थी और शीघ्र ही मुझे शर्मिंदा होना था। जॉकी CBI निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा बलात्कार पर दिये गये आपत्तिजनक बयान से भारतीयों की सोच को जोड़कर माखौल बना रहे थे। भारत की उभरती अर्थव्यवस्था पर ये २ शब्द नहीं बोलते पर भारत को असभ्य-बर्बर बताने का प्रयास सदा चलता रहता है। इसके कारणों की विवेचना पर लम्बा लेख लिखा जा सकता है। हाल ही में हुयी दादरी की घटना पर इन चैनलों ने जमकर टिप्पणियाँ दी, कहना ना होगा बिना समुचित संधान किये। दूसरे प्रकार के चैनल भी अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं थे। 1 जॉकी पूरे सप्ताह केवल यही बोलता रहा--- "आज मैं बीफ खाकर नहीं आया हूँ, इसलिये audience का सिर खाऊँगा। और श्रुति, तुम मुझे मार भी नहीं सकती क्यूँकि Bay Area में Law & Order है।"
भारत में भी कई शर्मनाक घटनाएँ घटीं--- मसलन बेहूदा किस्म की बीफ पार्टी का आयोजन और इसका समर्थन नहीं करने के कारण राहुल ईश्वर पर हमला, लालू यादव द्वारा गोपालक हिन्दू समाज पर भद्दी टिप्पणी, दादरी झगड़े के मुसलमान मृतक को अधिकांश राजनीतिक पार्टियों और मीडिया द्वारा निष्पाप साबित कर मुस्लिम समाज की भावना उकसाना, हिन्दू गौरक्षक के हत्या की उपेक्षा करके हिंदुओं में असंतोष फैलाना।
शोभा डे ने चुनौतीपूर्ण लहज़े में गौमांस खाने की घोषणा की। सवाल यह है कि हम किस स्तर तक गिरेंगे। जिस गाय को आप जानवर समझकर खाने की बात कर रहे हैं और आर्थिक लाभ हेतु तस्करी या निर्यात कर रहे हैं वह ग्रामीण भारत का आधार है। बच्चों के दूध का मुख्य श्रोत, परिवार के आजीविका का साधन भी और बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था भी है। आज एक बड़ी आबादी खेती से भाग कर शहरों में बदतर जीवन जीने को मज़बूर है क्योंकि कृषि में लाभ नहीं दिखता। इसका 1 बड़ा कारण आस्थायुक्त पशुपालन से विमुख होना है। गौधन परिवार का भाग है।
फ्रांस में घोड़े के मांस की माँग है और आपूर्ति के लिये अन्य देशों से आयात करता है। अमेरिका कुछ समय तक अपने देश से भेजा करता था। अभी अश्व वध पर पाबंदी है और इसका आस्था से जुड़ा कोई कारणनहीं। आप में से कुछ मित्र जानते होंगे कि स्पेन से जब 16वीं शताब्दी में बसने के इरादे से लोगों की खेप अमेरिकी तटों पर भेजनी शुरू की गयी तब एक बड़ी चुनौती यातायात के लिये घोड़ों की थी। खाने की समस्या सहजता से हल हो गयी क्यूँकि साथ आये सुवर 10-10 बच्चे देते थे और प्रजनन भी बहुत तेजी से करते थे। कालांतर में स्पेन से घोड़े लाये गये और नयी नस्ल तैयार की गयी … घोड़े गोरों के शान का प्रतीक थे और स्थानीय आबादी को घोड़े चढ़ने की मनाही थी। घोड़ों की संख्या सुवरों के अनुपात में नहीं बढ़ी क्यूँकि वे एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। मस्टंग नस्ल के घोड़े के नाम पर एक आलीशान कार भी है।
बहरहाल, जब स्थानीय रूप से घोड़ों के प्रजनन केंद्र और मंडियाँ सजने लगी तब माँस के लिये घोड़े काटने लगे(हालाँकि अन्य यूरोपीय देशों की अपेक्षा कम) … एक बात और जानने योग्य है कि घोड़े अब भी कुछ ही राज्यों में हैं। लगभग 1 दशक पहले सरकार ने अश्वमांस पर पाबंदी को उचित समझा और गिनती के पाये जानेवाले कत्लखानों को बंद करवा दिया। इस विषय में विपरीत मत रखनेवालों से सीनेट में चर्चा 10 वर्षों से टाली जा रही है परन्तु कोई इसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाता। ध्यान देने की बात है कि घोड़ों से ना कोई आस्था जुड़ी है इनकी और ना ही अर्थव्यवस्था। सिर्फ और सिर्फ 400 साल पुराना यूरोपीय तार।
गायों से तो हम सबके पूर्वज जुड़े हैं। 17वीं सदी में मेरे पूर्वज जिस गाँव में आ बसे थे वहाँ आज भी परिवार के साथ आयी गौमाता के वंशज खूँटे पर दीखते हैं। राजा दिलीप की गाय, कपिल मुनि की गाय--- ये कहानियाँ तो हमारा बचपन बनाती हैं।
ना ना शोभाजी, गाय केवल जानवर नहीं है। कम से कम मेरे लिये तो नहीं।
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