Tuesday, September 6, 2016

अट्टाहास

पिछले कुछ दिनों से मँझली की बहुत याद आ रही है। वैसे तो आज तक ऐसा कोई सप्ताह नहीं बीता होगा जब मँझली की याद न आयी हो, परंतु अभी मनोस्थिति ऐसी है मानो धृतराष्ट्र की सभा में विदुर। मँझली का जीवन एक तमाचा है पूरे गाँव के शराफत के मुखौटे पर। 

मालतीजी के 5 बच्चों में दूसरे क्रम पर थी मँझली जिसे आजीवन किसी का स्नेह नहीं मिला, कभी-कभार परायों से दया के दो बोल सुनने को मिले परंतु सगी माँ ने जन्म देते ही मानो मुँह फेर लिया हो। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो 2 प्रमुख कारण दिखते हैं - (१) '80 के दशक के ग्रामीण समाज में कोख से बेटा जनने का तीव्र दवाब (२) अल्पायु में हुआ बेमेल विवाह। मँझली के हिस्से की घृणा को उपरोक्त कारण स्थापित नहीं कर पाते हैं क्योंकि बेटी तो मँझली के पहले भी हुयी और बाद में भी। मुझे आजतक यह बात समझ नहीं आयी कि बेमेल शादियों से भी गुच्छा भर बच्चे कैसे आ जाते हैं। 

मोहल्ले की सरकारी पाठशाला की दीदीजी ने कविता नाम से मँझली का दाखिला लिया,यह बात और है कि घर-बाहर इस नाम से शायद ही किसी ने पुकारा हो। उम्र में मुझसे 5 साल छोटी कविता से कुल मिलाकर 8 बार मिलना हुआ है अबतक। पिताश्री के इस परिचित परिवार में पहली बार कविता को अपने नये-नवेले पहले भाई (संतान क्रमांक 4) को दुलारते देखा तब उस बच्ची की उम्र गुड़ियों से खेलने की थी। दूसरी बार जब उसके बारे में सुना तब उसकी पिटाई का कारण एक अनार के लालच में अपना स्लेट(पाटी) किसी लड़के को देना था। इस उम्र में वैसे तो अभिभावक समझाते या जिद पूरी करते हैं परंतु मँझली की सारी शिक्षा टेढ़ी-मेढ़ी छड़ी की चोट पर ही हुयी है। अधिक सदस्यों वाले परिवारों में छोटी-छोटी जरूरतों के लिये संघर्ष होता है, चालाकी से अपने हिस्से के रोटी-कपड़े पर अधिकार जमाया तो ठीक वरना पछतावा। कविता इस मामले में पीछे रह जाती थी लेकिन पछतावे की शिकन नहीं। कालांतर में पर्व-त्यौहारों में तल्लीनता से भजन गाते देखा, जब भी देखा भाई-बहनों का कोई काम करते या मौखिक-शारीरिक दुर्व्यवहार सहते ही पाया।  प्रकृति के अपने कुछ नियम होते हैं, जिसके तहत कविता ठोस होती गयी कभी कोई अंग-भंग ना हुआ। प्रत्यक्ष रूप से तो मन से भी नहीं टूटी, निर्मल खिलखिलाहट और सेवाभाव। 

आखिरी बार तिरस्कार के इस दर्पण को देखा तब यौवन की दहलीज़ पर थी, निर्मल मुस्कान, सहज स्वभाव और जिम्मेदारी से परिपूर्ण, स्नातक की डिग्री अर्जित कर चुकी थी। बड़ी बहन का लगन होने भर की देर थी, कविता और छोटी बहन भी तैयार थी विवाह को। ३ बेटियों की शादी का मतलब था दहेज़ का तिगुना भार, माली हालत पतली थी और फिर बेटों की जिंदगी। देश का यह ऐसा हिस्सा था जहाँ GDP के आँकड़े में योग नहीं, भाग लगता था। 

आठवें और आखिरी मुलाकात को बीते दस वर्ष हो चुके थे। पिछले महीने मालतीजी से फोन पर बात हुयी तो मैंने सबका कुशल-क्षेम पूछा और उन्होंने दो दामाद, दो नाती और दो बेटों के यश का समाचार बता दिया परंतु चालाकी से कविता की कोई खबर नहीं दी। शायद मुझे इस रवैये का पूर्वानुमान था, सो मैंने बिना देर किये पूछ डाला ---"और कविता?" जवाब मिला --- "मर गयी वो मेरे लिये"... मानो मेरे कान को छूकर गोली निकल गयी हो। एक मिनट बाद जब चेतना लौटी तब फोन काट दिया। विचारशून्यता की हालत में भी एक बात पच नहीं रही थी कि कुदरत ने जब उसे घातक मार-पीट के बाद भी बचाये रखा, तिरस्कार को मुस्कान में बदलने की कला दी फिर किस ताकत ने प्राण हर लिये बेचारी के? तहकीकात के बाद पता चला कि एक अतिसाधारण से आवारा मुसलमान के साथ जाने के बाद परिवार ने रिश्ते की डोर खोल दी और अब वह बुर्कानशीं हो चुकी थी। इसके बाद का संवाद आंतरिक क्रोध और विवेक के बीच सन्नाटे में हुआ। 
 
क्या मँझली इतनी अकेली पड़ गयी थी कि कॉलेज जाती लड़कियों को निहारने वाले मवाली की छेड़छाड़ में उसे अपने लिये स्नेह दिखने लगा था? क्या 'कुपतरी' (कुपात्री का अपभ्रंश और घरवालों द्वारा मँझली को दिया गया संबोधन) ने अपने परिवार का बोझ काम करने के लिये किया? भजन गानेवाली लड़की के लिये कितना मुश्किल हुआ होगा अजान देनेवाले के घर की 'बहू' बनना? क्या उसे एक समारोह तक के अधिकार से वंचित रखना पाप नहीं है? क्या लाचारी ही कविता की नियति है? 

ऐसे सैंकड़ों प्रश्नों के साथ 10 साल पुरानी उसकी निर्मल मुस्कान अट्टाहास जान पड़ती है। हिन्दू समाज के सभी द्रोणाचार्यों, भीष्म पितामहों, धृतराष्ट्रों और विदुरों की सजा उनकी ग्लानि है जो आजतक समाज को मुक्त नहीं करा पायी दहेज़ रूपी राक्षस और बेटियों की दुर्गति से। 

कहीं ऐसा तो नहीं कि ग्लानि भी मेरी निजी कल्पनामात्र हो और समाज की आत्मा मर चुकी हो।
 

Tuesday, June 7, 2016

आत्मसलाघा

नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनाव का प्रचार अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज़ पर किया। कुछ लोगों ने इसकी निंदा की और कईयों को यह बहुत पसंद आया क्योंकि हम भारतवासी 20-25 प्रधानमंत्री उम्मीदवारों से तंग आ गये थे। गिनती के पचास बुद्धुजीवियों को छोड़ दें तो सभी ने मोदीजी के शासन को भ्रष्टाचार मुक्त और न्यायसंगत माना है। प्रधानमंत्री बनने के बाद इन्होंने अथक और अनवरत काम किया है और जब भी भाषण/दर्शन का सौभाग्य मिला, यही लगा कि भारतमाता का सच्चा सपूत कहलाने मात्र की प्रेरणा से आप अप्रतिम कार्य कर सकते हैं। 

परन्तु मेरे देश में एक रोंदू वर्ग है, और मैं यह विशेषण इसलिये नहीं दे रहा हूँ क्योंकि उन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया या वोट देकर भी दिन-रात गाली देता है। बल्कि इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उन्हें लगता है कि 5 साल में एक बार वोट देकर(या ना देकर) उन्होंने बहुत बड़ा एहसान कर दिया है देश पर {ये लोग टैक्स डर के मारे देते हैं और जब मौका लगे चुराते भी हैं}, अब सभी बातों के लिये सरकार की जिम्मेदारी  ... ये इतने निराशावादी हैं कि हर तीसरे लाइन के बाद कहेंगे----"कुछ नहीं होगा यहाँ"... जब किसी अच्छी सरकारी नीति के बारे में बताइये तब अर्द्धदार्शनिक मुद्रा में कहेंगे ---"सब पार्टी एक जैसा है"... इतनी नकारात्मकता है इनके भीतर कि बात शुरू कीजिये अन्तर्राष्ट्रीय रिश्तों से, तो ये ख़त्म करेंगे संसद कैंटीन की सब्सिडी पर.... और जब बताइये कि भाई सब्सिडी तो ख़त्म हो गयी तब पहुँच जायेंगे ----"जेटली को वित्त मंत्री क्यों बनाया"...... भाई, 10  साल प्रधानमंत्री राज्यसभा का था तब ठीक था और कोई पहली बार राज्यसभा से तो मंत्री बना नहीं है और भाजपा ने तो संसद के दो सदन बनाये नहीं हैं...... "सब पार्टी एक जैसा है" .... NOTA को वोट दूँगा मैं तो(नया फैशन).... भाजपा में 500 वें नंबर का कोई साक्षी महाराज या साध्वी प्राची कोई बयान दे तो बहस करने आ जायेंगे------ खैर इन चर्चाओं में सैकड़ों घंटे बर्बाद करता हूँ और करता रहूँगा।  

आज का मुद्दा है इन रोंदूओं के अमरीका में बसने की अभिलाषा के मुद्दे पर। उपरोक्त विशेषता वाले अधिकांश लोगों को लगता है कि भारत से बेकार कोई देश नहीं और अमरीका का वीज़ा लग जाये तो जीवन सफल। अमरीका में लम्बे समय तक यूरोपीय सजायाफ्ता अपराधियों का वास था और उसके बाद जब गोरों ने इस भूभाग को अथाह संसाधनों वाला पाया तब नियम-कानून की सख़्ती प्रारंभ की। आज भी बहुत से राज्यों के कानून अपरिपक्व हैं, परन्तु अच्छी बात यह है कि कानून-व्यवस्था सख्त है। भारत कम से कम 8 सहस्राब्दियों तक मुख्यतया मूल्यों वाला देश रहा है और समाज के लोग मूल्यों/लोकलाज के कारण शान्तिपूर्वक रहे, कानून की उतनी आवश्यकता नहीं आयी। हालाँकि बदलते परिवेश में समय आ गया है कि हम नये देशों से कानून की सख्ती की सीख लें। 

अमरीका में चुनाव का समय चल रहा है, अरबों डॉलर के खर्चे से यह दुनिया का सबसे महँगा राष्ट्रपति चुनाव होता है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रोटेस्टैंट ईसाई हैं चर्च गवर्नमेंट समूह के, इनके ऊपर नस्लीय भेदभाव के आरोप आम बात है। भारतीय मीडिया पेरिस हमले के बाद मुसलमानों को लेकर ट्रम्प द्वारा दिये बयान पर चर्चा कर चुकी है और चर्चाओं में इन्हें विलेन के तौर पर दिखाया गया है। सच्चाई यह है कि आये दिन ये विवादित बयान देते रहते हैं सभी Non-White क्रिस्चियन नस्लों के खिलाफ, जिससे ना इनके कोर वोट बैंक White Christian में कोई फर्क पड़ता है और ना इनके व्यापार में। एक और बात, यह अपना लम्बा-लम्बा विवादित बयान तैयार करके लाते हैं---कभी सफाई भी नहीं देते और माफ़ी का तो सवाल ही नहीं।  ताजा मामला इनके ऊपर चल रहे धोखाधड़ी के मामले का है। जज ने आरोप सही ठहराये तो बकायदा बयान जारी कर दिया कि जज मेक्सिको मूल का है और नस्लीय आधार पर पूर्वाग्रह से ग्रसित है। एक बार नहीं, बार-बार कहा  ...  और हाँ, यह शख्स रिपब्लिकन पार्टी के 500वें  नंबर का नहीं, राष्ट्रपति उम्मीदवार है। 

रोंदू अब भी कहेंगे, कुछ भी कह लो अमरीका इज़ ग्रेट  .... बीजेपी मुसलमान विरोधी है ...  मेरे 15 लाख दो .... प्याज कितना महँगा है ... 

By the way, आज एक विज्ञापन देखा कि मुंबई में Lodha estate और ट्रम्प मिलकर आवासीय Trump Tower ला रहे हैं, (कीमत 9 करोड़++)