पिछले कुछ दिनों से मँझली की बहुत याद आ रही है। वैसे तो आज तक ऐसा कोई सप्ताह नहीं बीता होगा जब मँझली की याद न आयी हो, परंतु अभी मनोस्थिति ऐसी है मानो धृतराष्ट्र की सभा में विदुर। मँझली का जीवन एक तमाचा है पूरे गाँव के शराफत के मुखौटे पर।
मालतीजी के 5 बच्चों में दूसरे क्रम पर थी मँझली जिसे आजीवन किसी का स्नेह नहीं मिला, कभी-कभार परायों से दया के दो बोल सुनने को मिले परंतु सगी माँ ने जन्म देते ही मानो मुँह फेर लिया हो। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो 2 प्रमुख कारण दिखते हैं - (१) '80 के दशक के ग्रामीण समाज में कोख से बेटा जनने का तीव्र दवाब (२) अल्पायु में हुआ बेमेल विवाह। मँझली के हिस्से की घृणा को उपरोक्त कारण स्थापित नहीं कर पाते हैं क्योंकि बेटी तो मँझली के पहले भी हुयी और बाद में भी। मुझे आजतक यह बात समझ नहीं आयी कि बेमेल शादियों से भी गुच्छा भर बच्चे कैसे आ जाते हैं।
मोहल्ले की सरकारी पाठशाला की दीदीजी ने कविता नाम से मँझली का दाखिला लिया,यह बात और है कि घर-बाहर इस नाम से शायद ही किसी ने पुकारा हो। उम्र में मुझसे 5 साल छोटी कविता से कुल मिलाकर 8 बार मिलना हुआ है अबतक। पिताश्री के इस परिचित परिवार में पहली बार कविता को अपने नये-नवेले पहले भाई (संतान क्रमांक 4) को दुलारते देखा तब उस बच्ची की उम्र गुड़ियों से खेलने की थी। दूसरी बार जब उसके बारे में सुना तब उसकी पिटाई का कारण एक अनार के लालच में अपना स्लेट(पाटी) किसी लड़के को देना था। इस उम्र में वैसे तो अभिभावक समझाते या जिद पूरी करते हैं परंतु मँझली की सारी शिक्षा टेढ़ी-मेढ़ी छड़ी की चोट पर ही हुयी है। अधिक सदस्यों वाले परिवारों में छोटी-छोटी जरूरतों के लिये संघर्ष होता है, चालाकी से अपने हिस्से के रोटी-कपड़े पर अधिकार जमाया तो ठीक वरना पछतावा। कविता इस मामले में पीछे रह जाती थी लेकिन पछतावे की शिकन नहीं। कालांतर में पर्व-त्यौहारों में तल्लीनता से भजन गाते देखा, जब भी देखा भाई-बहनों का कोई काम करते या मौखिक-शारीरिक दुर्व्यवहार सहते ही पाया। प्रकृति के अपने कुछ नियम होते हैं, जिसके तहत कविता ठोस होती गयी कभी कोई अंग-भंग ना हुआ। प्रत्यक्ष रूप से तो मन से भी नहीं टूटी, निर्मल खिलखिलाहट और सेवाभाव।
आखिरी बार तिरस्कार के इस दर्पण को देखा तब यौवन की दहलीज़ पर थी, निर्मल मुस्कान, सहज स्वभाव और जिम्मेदारी से परिपूर्ण, स्नातक की डिग्री अर्जित कर चुकी थी। बड़ी बहन का लगन होने भर की देर थी, कविता और छोटी बहन भी तैयार थी विवाह को। ३ बेटियों की शादी का मतलब था दहेज़ का तिगुना भार, माली हालत पतली थी और फिर बेटों की जिंदगी। देश का यह ऐसा हिस्सा था जहाँ GDP के आँकड़े में योग नहीं, भाग लगता था।
आठवें और आखिरी मुलाकात को बीते दस वर्ष हो चुके थे। पिछले महीने मालतीजी से फोन पर बात हुयी तो मैंने सबका कुशल-क्षेम पूछा और उन्होंने दो दामाद, दो नाती और दो बेटों के यश का समाचार बता दिया परंतु चालाकी से कविता की कोई खबर नहीं दी। शायद मुझे इस रवैये का पूर्वानुमान था, सो मैंने बिना देर किये पूछ डाला ---"और कविता?" जवाब मिला --- "मर गयी वो मेरे लिये"... मानो मेरे कान को छूकर गोली निकल गयी हो। एक मिनट बाद जब चेतना लौटी तब फोन काट दिया। विचारशून्यता की हालत में भी एक बात पच नहीं रही थी कि कुदरत ने जब उसे घातक मार-पीट के बाद भी बचाये रखा, तिरस्कार को मुस्कान में बदलने की कला दी फिर किस ताकत ने प्राण हर लिये बेचारी के? तहकीकात के बाद पता चला कि एक अतिसाधारण से आवारा मुसलमान के साथ जाने के बाद परिवार ने रिश्ते की डोर खोल दी और अब वह बुर्कानशीं हो चुकी थी। इसके बाद का संवाद आंतरिक क्रोध और विवेक के बीच सन्नाटे में हुआ।
क्या मँझली इतनी अकेली पड़ गयी थी कि कॉलेज जाती लड़कियों को निहारने वाले मवाली की छेड़छाड़ में उसे अपने लिये स्नेह दिखने लगा था? क्या 'कुपतरी' (कुपात्री का अपभ्रंश और घरवालों द्वारा मँझली को दिया गया संबोधन) ने अपने परिवार का बोझ काम करने के लिये किया? भजन गानेवाली लड़की के लिये कितना मुश्किल हुआ होगा अजान देनेवाले के घर की 'बहू' बनना? क्या उसे एक समारोह तक के अधिकार से वंचित रखना पाप नहीं है? क्या लाचारी ही कविता की नियति है?
ऐसे सैंकड़ों प्रश्नों के साथ 10 साल पुरानी उसकी निर्मल मुस्कान अट्टाहास जान पड़ती है। हिन्दू समाज के सभी द्रोणाचार्यों, भीष्म पितामहों, धृतराष्ट्रों और विदुरों की सजा उनकी ग्लानि है जो आजतक समाज को मुक्त नहीं करा पायी दहेज़ रूपी राक्षस और बेटियों की दुर्गति से।
कहीं ऐसा तो नहीं कि ग्लानि भी मेरी निजी कल्पनामात्र हो और समाज की आत्मा मर चुकी हो।
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