Wednesday, July 5, 2017

सभी भारतीय भाषाएँ राष्ट्रीय हैं

मेरी नानी का 58 वर्ष की आयु में 1994 में देहावसान हो गया। उन्होंने अपने जीवन में 4 बेटों और 3 बेटियों की परवरिश सहित 13 पोते-पोतियों को  लाड़-प्यार दिया। समय-समय पर हम 6 नाती-नातिन भी उनका मधुर स्नेह पाते थे। आँगन के 5 अन्य परिवार भी उनके अपने थे और कलह-कलेश से वे अधिकांशतः अछूती थीं। शिक्षा के मामले में शायद उन्हें अक्षरज्ञान भी ना हो, परन्तु अपने परिवार में सबको कम से कम स्नातक तक पढ़ाया और शिक्षा का महत्व समझते हुये 6 बहु-बेटियों को शिक्षिका बनाया। कुल मिलाकर अल्पायु में उपलब्धियों से परिपूर्ण जीवन। 

नानी की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने अकेले ही भारत के सभी प्रमुख तीर्थस्थलों का तीर्थाटन किया था। इंटरनेट पर इस कहानी को पढ़नेवाले शायद नहीं समझ पायेंगे कि देहात की एक महिला के लिये आज से 30-40 साल पहले ऐसा कर पाना कितनी बड़ी बात रही होगी। भाषा के नाम पर टूटी-फूटी हिंदी से मिलती-जुलती बोली वज्जिका, कपड़े की छोटी गठरी और अतिसीमित धन। नानी के सिवाय कोई नहीं जान पाया कि उनकी यात्रायें कितनी दुर्गम या सुगम रही, परन्तु हर तीर्थाटन के बाद गजब की संतुष्टि। केदार-बद्रीनाथ की यात्रा हो या रामेश्वरम-धनुषकोटि, द्वारिकाधाम हो या जगन्नाथपुरी, वैष्णोदेवी हो या प्रयाग - हमलोगों को मिलती थी कहानियाँ और प्रसाद की पुड़िया। कहानियाँ ऐसी मानो साक्षात् वैकुण्ठलोक या से होकर आया हो वाचक। यह भी सच है कि निष्प्राण होने के कुछ घंटे पहले उन्हें अंतिम समय का बोध हो गया था और मृत्यु आसान थी। 

भारत भ्रमण दादाजी ने भी किया था दादी के साथ, मेरे जन्म से वर्षों पूर्व। उनसे ही पता चला कि रामेश्वरम की यात्रा किये बिना तीर्थाटन अपूर्ण है। मैंने तो अभियांत्रिकी की पढ़ाई के लिये बैंगलोर का रुख किया, उन्होंने सैर-सपाटे और तीर्थ के तरीके से किया था। किंवदंती तो ऐसी भी हैं कि आदि-शंकराचार्य ने मिथिलांचल के जिन मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया और कालांतर में सपत्नीक शिष्य स्वीकारा उनका भी मेरे गाँव के पंडितजी के पूर्वजों से रिश्ता था(अपुष्ट)। 

मेरे विवाह के कुछ वर्ष पूर्व जब मैं भावी पत्नी की नानी सेसंवाद किया तब  मेरी उस  जिज्ञासा का समाधान हो गया कि मेरी नानी ने परप्रांतों में तीर्थाटन कैसे किया होगा। सबसे अच्छी बात तो यह होती है संवाद में कि भाव, भाषा-शब्दों पर कई गुणा भारी पड़ते हैं। मैंने हमेशा ही प्रयास किया है कि कुछ शब्दों और वाक्य रचना के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं में संवाद कर सकूँ। 

बैंगलोर में मैंने एक दशक से अधिक का समय 4 घरों में बिताया है और दो घरों में मुझे सगे बेटे सा स्नेह मिला है। मेरे जीवन की अधिकांश उपलब्धियाँ कर्णाटक से जुड़ीं हैं और मेरे प्राणप्रिय मित्र भी यहीं की देन हैं। आज किसी राजनीतिक हित को साधने के लिये कोई समूह यह साबित नहीं कर सकता है कि किसी भारतीय के लिये अन्य भारतीय भाषायें उतनी ही परायी हैं जितनी कि कोई विदेशी भाषा(अंग्रेजी)। आज कर्णाटक के एक ब्लॉगर को संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के समर्थन में लिखे लेख के कारण निशाने पर लेनेवाली भीड़ कभी जमीनी सच्चाई जानने हेतु भारत के किसी भी सुदूर गाँव में जाकर देखे कि क्या ग्रामीण अंग्रेजी में संवाद कर पाते हैं या हिंदी में। यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि वे लोग निरा मूर्ख हैं जो समझते हैं कि आप हिंदी के अहँकार  में सराबोर होकर अन्य भारतीय भाषाओं का अपमान करोगे और इस भ्रम में रहेंगे कि मात्र हिंदी ही राष्ट्रीय भाषा है। 

सभी भारतीय भाषायें राष्ट्रीय हैं और यह हमारा नैसर्गिक दायित्व है कि हम सभी भारतीय भाषाओं को माँ का सम्मान दें। 

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