Friday, October 23, 2015

स्टोरीटाइम--
कक्षा 9 की बात है, सरकारी विद्यालय की पढ़ाई नाकाफ़ी साबित होती देख पिताश्री ने अपने एक मित्र की कोचिंग सेंटर में 2 घंटे की क्लास लगवा दी। 10वीं की बोर्ड का मामला था, फेल होना मतलब बिरादरी में नाक कटना। बॉयज हाईस्कूल से अलग माहौल था। कहाँ तो बॉयज स्कूल से लंपटों की टोली कक्षा से भागकर कन्या उच्च विद्यालय के चक्कर काटने जाती थी और यहाँ एक ही कक्षा में आस-पास बैठकर मास्टरजी को 'सुनते' थे। मास्टरजी लोग भी बेरोजगारी के मारे युवा थे। कुछ पाजी किस्म के छोरों ने मास्टरजी के कमरे में जासूसी करके "ललितरस" की सामग्रियाँ जुटा ली। कुल मिलाकर मेरे अंदर की सोयी हुयी आशिकी मूर्तरूप लेने लगी।
खैर, हमउम्र पड़ोसी को झरोखे से झाँकने के आगे नहीं बढ़ पाये हम। किशोरावस्था की सारी कहानियाँ जिनका मैं नायक था, सपनों में ही बुनी गयीं और दम तोड़ती चली गयीं। किसी मुर्ख ने सिद्धान्त दे रखा है कि "सच्चा प्रेम" एक बार ही होता है। बकवास... कोरा बकवास.... बार-बार होता है...सीधी भाषा में प्यार मतलब अच्छा लगना... क्षणिक भी हो सकता है और स्थायी भी। जयप्रकाश बाबू और प्रभावती देवी जैसा भी हो सकता है और नेहरू-एडविना जैसा भी। अपने खाते में भी अनेकों क्षणिक और कुछ स्थायी प्रेम कहानियाँ हैं।
IT की नौकरी में भावनाओं को वश में रखना सीखना होता है, सो मैंने सीखा। नैन मटक्के की एक गलत रीडिंग आपको परेशानी में डाल सकती है। इंटर्नशिप के लिये हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स कर रहे युवतियों की टोली पधारी। इनमें से अधिकांश ने डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के बाद यह कोर्स चुना था। सामान्य सी दिखनेवाली एक लड़की अलग-थलग सी रहती थी, अकेलेपन को छुपाने और ध्यान बटोरने के लिये चढ़ी रहती थी रीडिंग ग्लास और खुले हुये पन्ने। मेरे प्यार की दुकान तो एकांतवासिनियों और उपन्यास पढ़नेवालों के लिये हमेशा खुली रहती हैं, सो बत्ती जल गयी। पता था कि गलत सिग्नलिंग से दुर्घटना घटेगी, सो कनखियों तक ही सीमित रही अपनी कहानी।
मुफ़्त की दारु भकोसने को कॉर्पोरेट जगत में टीम बिल्डिंग कहते हैं। हम दोनों चश्माधारी जंतु भी मौजूद थे लेकिन मोबाइल फोन में निगाहें टिकाकर स्वयं को व्यस्त साबित करने पर तुले थे। हालात ने भी हमारे इस नीरस कृत्य से झुँझलाकर ललित रस की याद दिलाने हेतु टीम बिल्डिंग इवेंट के मुख्य आकर्षण zorb बॉल में हम दोनों को ढ़केल दिया। हामी दोनों की थी। तथाकथित अबलाओं को मिली अतिरिक्त स्पर्श इन्द्रिय ने त्वरित ईशारा भेजा---- 10 सेकंड की मुफ़्त ज़ोर्बिंग से कुछ और की उम्मीद मत लगाओ। समय और बटुआ ढ़ीला करना होगा। अपने पास दोनों की कमी है, सो मैंने प्यार के कपाट बंद किये। इति...
कंप्यूटर स्क्रीन की तरफ टकटकी लगाये कभी-कभी मैं कल्पना-जगत में भी होता हूँ। स्मशान की भाँति शाँत मन को कंप्यूटर स्क्रीन पर अघोड़ी की तरह टपके एक मेसेज ने छेड़ा। बंद पड़े प्यार के कारखाने में आज हलचल हुयी। विशुद्ध हिंदी क्षेत्र से होने और मुझे भी उसी अंचल का जानने के बावजूद उनकी अंग्रेज़ी बदस्तूर जारी रही। हमने भी अपनी बात को अनुवाद करके चिपकाया। पूछ डाला, कैसी कहानियाँ पसंद हैं और उत्तर था नवसिखुआ छाप। दो मीठे बोल और मैंने प्रकाशन के अपने सपने उड़ेल दिये। शुक्रवार का दिन था और काम का बोझ कम।
स्क्रीन पर चमका---- "Insha Allah"...
मुझे समझ नहीं आया कि अंग्रेजी में चल रही बातचीत में अरबी कहाँ से घुस आयी। मैंने लिखा---
"What does that mean"..
मोहतरमा ने मेरे अज्ञान के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुये बताया इसका अर्थ और फिर 2 मिनट का सन्नाटा(शायद मेरी फेसबुक प्रोफाइल खंगालने गयी थीं)।
"Are U RSS type or something"...
कहाँ तो मैं सोच रहा था कि उसके गृहजिले के हालिये दंगे की चर्चा करूँगा, हालात समझूँगा.... यहाँ तो मुझे Humanity पर व्याख्यान मिलने लगा। यथोचित उत्तर देते हुये मैंने लम्बी चर्चा को पूर्णविराम दिया।
पूरी रात करवटें बदलते बीती और सुबह धर्मपत्नी निक्कर पर इस्त्री चलाती दिखी ताकि उसका पति कुछ बच्चों को इकट्ठा करके कबड्डी खेलने जाये। क्षणिक और स्थायी प्यार का अंतर इस 1 दृश्य ने समझा दिया।

Thursday, October 22, 2015

अमेरिका में 3 तरह के रेडियो स्टेशन होते हैं--- पहला, जिधर गोरे जॉकी फटाफट गपशप करते हैं और अंग्रेज़ी गाने सुनाते हैं(आवाज़ से भी चमड़ी का रंग पता चलता है यहाँ) गपशप में फुटबॉल, मौसम से लेकर राजनैतिक समाचारों पर सरसरी टिप्पणी होती है। इसके श्रोता या तो तन/मन से गोरे होते हैं अथवा उनके क्षेत्र में दूसरे प्रकार के चैनल प्रसारित नहीं होते। इन RJ की वाक्शैली बेहतरीन होती है, गीतों के चुनाव के विषय मुझे कम ज्ञान है।

दूसरे प्रकार के स्टेशन गिनती के हैं और सीमित क्षेत्रों में है जहाँ देसी(भारतीय + पाकिस्तानी) आबादी है। यहाँ उद्घोषक की शैली नकलचीनुमा जान पड़ती है परन्तु इनके अपने श्रोता हैं। मुख्यतया यह एक प्रचार माध्यम है छोटे-बड़े देसी प्रतिष्ठानों का तथा भारतीय भाषाओं के कार्यक्रम होते हैं।

13 नवम्बर '13 को मैं अमेरिका के सुदूरवर्ती राज्य में था जहाँ दूसरी कोटि के चैनल नहीं आते थे... अपने  अकेलेपन से  लड़ने के लिये मैंने रेडियो चलाया और संयोग से 1-2 गाने के बाद ही भारत की खबर चली। मेरी प्रसन्नता टिकाऊ नहीं थी और शीघ्र ही मुझे शर्मिंदा होना था। जॉकी CBI निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा बलात्कार पर दिये गये आपत्तिजनक बयान से भारतीयों की  सोच को जोड़कर माखौल बना रहे थे। भारत की उभरती अर्थव्यवस्था पर ये २ शब्द नहीं बोलते पर भारत को असभ्य-बर्बर बताने का प्रयास सदा चलता रहता है। इसके कारणों की विवेचना पर लम्बा लेख लिखा जा सकता है। हाल ही में हुयी दादरी की घटना पर इन चैनलों ने जमकर टिप्पणियाँ दी, कहना ना होगा बिना समुचित संधान किये। दूसरे प्रकार के चैनल भी अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं थे। 1 जॉकी पूरे सप्ताह केवल यही बोलता रहा--- "आज मैं बीफ खाकर नहीं आया हूँ, इसलिये audience का सिर खाऊँगा। और श्रुति, तुम मुझे मार भी नहीं सकती क्यूँकि Bay Area में Law & Order है।"

भारत में भी कई शर्मनाक घटनाएँ घटीं--- मसलन बेहूदा किस्म की बीफ पार्टी का आयोजन और इसका समर्थन नहीं करने के कारण राहुल ईश्वर पर हमला, लालू यादव द्वारा गोपालक हिन्दू समाज पर भद्दी टिप्पणी, दादरी झगड़े के मुसलमान मृतक को अधिकांश राजनीतिक पार्टियों और मीडिया द्वारा निष्पाप साबित कर मुस्लिम समाज की भावना उकसाना, हिन्दू गौरक्षक के हत्या की उपेक्षा करके हिंदुओं में असंतोष फैलाना।

शोभा डे ने चुनौतीपूर्ण लहज़े में गौमांस खाने की घोषणा की। सवाल यह है कि हम किस स्तर तक गिरेंगे। जिस गाय को आप जानवर समझकर खाने की बात कर रहे हैं और आर्थिक लाभ हेतु तस्करी या निर्यात कर रहे हैं वह ग्रामीण भारत का आधार है। बच्चों के दूध का मुख्य श्रोत, परिवार के आजीविका का साधन भी और बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था भी है। आज एक बड़ी आबादी खेती से भाग कर शहरों में बदतर जीवन जीने को मज़बूर है क्योंकि कृषि में लाभ नहीं दिखता। इसका 1 बड़ा कारण आस्थायुक्त पशुपालन से विमुख होना है। गौधन परिवार का भाग है।

फ्रांस में घोड़े के मांस की माँग है और आपूर्ति के लिये अन्य देशों से आयात करता है। अमेरिका कुछ समय तक अपने देश से भेजा करता था। अभी अश्व वध पर पाबंदी है और इसका आस्था से जुड़ा कोई कारणनहीं। आप में से कुछ मित्र जानते होंगे कि स्पेन से जब 16वीं शताब्दी में बसने के इरादे से लोगों की खेप अमेरिकी तटों पर भेजनी शुरू की गयी तब एक बड़ी चुनौती यातायात के लिये घोड़ों की थी। खाने की समस्या सहजता से हल हो गयी क्यूँकि साथ आये सुवर 10-10 बच्चे देते थे और प्रजनन भी बहुत तेजी से करते थे। कालांतर में स्पेन से घोड़े लाये गये और नयी नस्ल तैयार की गयी … घोड़े गोरों के शान का प्रतीक थे और स्थानीय आबादी को घोड़े चढ़ने की मनाही थी। घोड़ों की संख्या सुवरों के अनुपात में नहीं बढ़ी क्यूँकि वे एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। मस्टंग नस्ल के घोड़े के नाम पर एक आलीशान कार भी है।

बहरहाल, जब स्थानीय रूप से घोड़ों के प्रजनन केंद्र और मंडियाँ सजने लगी तब माँस के लिये  घोड़े काटने लगे(हालाँकि अन्य यूरोपीय देशों की अपेक्षा कम) … एक बात और जानने योग्य है कि घोड़े अब भी कुछ ही राज्यों में हैं। लगभग 1 दशक पहले सरकार ने अश्वमांस पर पाबंदी को उचित समझा और गिनती के पाये जानेवाले कत्लखानों को बंद करवा दिया। इस विषय में विपरीत मत रखनेवालों से सीनेट में चर्चा 10 वर्षों से टाली जा रही है परन्तु कोई इसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाता। ध्यान देने की बात है कि घोड़ों से ना कोई आस्था जुड़ी है इनकी और ना ही अर्थव्यवस्था। सिर्फ और सिर्फ 400 साल पुराना यूरोपीय तार।

गायों से तो हम सबके पूर्वज जुड़े हैं। 17वीं सदी में मेरे पूर्वज जिस गाँव में आ बसे थे वहाँ आज भी परिवार के साथ आयी गौमाता के वंशज  खूँटे पर दीखते हैं। राजा दिलीप की गाय, कपिल मुनि की गाय--- ये कहानियाँ तो हमारा बचपन बनाती हैं।

ना ना शोभाजी, गाय केवल जानवर नहीं है। कम से कम मेरे लिये तो नहीं।

Tuesday, June 23, 2015

इस धरती पर "चमन चुतिया" नाम की एक प्रजाति है। जाहिर है उस प्रजाति के कुछ बहादुर फेसबुक पर भी दूकान सजायेंगे। इसे संयोग ही जानिये कि इनकी अधिकांश आबादी कजरी सर की पार्टी के पोस्ट परोसती हैं, बिना अपनी अक्ल का छौंका लगाये।

आज महात्माजी लोग *सुषमा_बेल्स_ललित ट्रेंड करा रहे हैं और ललित मोदी की ठरकी छाप फोटो चेप रहे हैं---"यही है ह्यूमनिटेरिअन ग्राउंड?"।

सीधा-सीधा बता दूँ, ललित मोदी ने सूटकेस भेजा नहीं अभी तक--- तोतले की तो मैं सोनिया-प्रियंका कर दूँगा आज। IPL जिसके भी दिमाग की उपज हो, क्रिकेट और क्रिकेटर्स पर बहुत चमत्कार किया इस मेले ने। ITC होटल में काम करने वाले मित्र बताते थे गौरांगी विदेशीन बालाओं की चहलकदमी रात 3-4 बजे तक। क्या खिलाड़ी, टीम मेनेजर, जिसे जहाँ देखो गंध मचा रहा है। दारू बह रही है। बड़े रसूख वाले लोग होते थे, जिसे देखो शरद पवार का नाती बना फिरता था।

आज भी याद है IPL 1, ऑफिस में सब प्लान कर रहे थे स्टेडियम में मैच देखने का। बखान भी कर रहे थे, फुल्टू पैसा वसूल है(तब टिकट भी सस्ती थी और चीयर डांसर्स आपके पसंद से 'नाचती' थी)। सबकुछ सही चल रहा था ललितवा के हक़ में, बीबी-cum-चाची भी इसकी मटरगश्ती के बीच में बाधा नहीं देती थी पर क्या खुजली हुयी लौंडे को---- पंगा ले लिया राजनीति के घाघ कांग्रेस से। कचहरी में मामले चले, जान की धमकी मिली सो अलग। लौंडे को अक्ल आयी---- ये क्या कर बैठा, बीबी-बच्चे तक को खा जाते है कांग्रेसी, मुझे तो बिना नून-मिरचाई लील लेंगे। ठान लिया जवान ने--- हम इंग्लैण्ड में रहूँगा और वकील साहब केस लड़ेंगे। मोनिया माई बौराईं--- पासपोर्ट जब्त करो इसका। कौन सा मेरे मायके का है या मेरे खसम का लंगोटिया।

ललितवा जज से करबद्ध---- माई-बाप, बचाय लो हमका। क़ानून का राज में दादागिरी करता है ई लोग, पहिले हमसे सटके रहता था--अब जान के पीछे है। कोर्ट बोला--- जा बेटवा, जी ले अपनी ज़िन्दगी।

बरस तीन बरस बीते, वकील साहब केस लड़ते रहे और ललितवा इंग्लैण्ड में ऐश करता रहा। बीबी-cum-चाची की कैंसर में विस्फोट हुआ। अपना हीरो बोला-- एक बार तो पतिधर्म निभा लूँ। हे जॉर्ज पंचम के नाती, मुझे लिस्बन जाने का कागज़ पत्तर दो, वापिस आप ही के यहाँ आऊंगा--- यहाँ बड़ा आराम है। 

भारत में सत्ता बदलने के बाद सबका व्यवहार बदल गया, अंग्रेज भी फॉर्मेलिटी के नाते पूछ लिये-- ऐ मोदी, इस रंगीन अदमी को बीमार बीबी का ऑपरेशन करवाने भेजा तो कट्टी तो नहीं करेगा। व्यापार-व्यवहार में कमी तो नहीं करेगा। सुषमा बोली, ईलाज कराने दो, बुरा नहीं मानूँगी। वैसे भी भागा नहीं है, हर तारीख पर हाजिरा देता है। पप्पू, पप्पी और आप्पी बोलता है--- ललितवा तो अंडरसन काका और कुतरोची मामा जैसा फेयर काम्प्लेक्सन नहीं है। उसको रियायत क्यूँ दिया?

ई सुषमा अपना सगा NSCN(K) का बहुत लॉस करवाई है। इसका विकेट चाहिये ही चाहिये।

Tuesday, May 12, 2015

राजनीतिक गिद्धों की पूजा--- नरबलि

लम्बी छुट्टी के बाद आज पुनः आपसे मुखातिब हूँ।  कल बातों-बातों में पिताजी ने पूछा---- "गजेन्द्र सिंह की 'आत्म'हत्या वाले मुद्दे पर आपने कुछ लिखा?" अचानक पूछे गए सवालों से मुझे हमेशा से ही सकपकाहट होती है, परन्तु चूँकि सवाल पिताश्री का था तो तुरंत संभलते हुए जवाब दिया--- "पिताजी, इस प्रकरण में कुछ भी लिखना दिवंगत आत्मा के प्रति अनादर होगा .... और फिर इस मुद्दे में कोई दम नहीं और बात पुरानी हो चली है .... मेरे अधिकांश मित्र असलियत जानते हैं केजरीवाल की कार्यप्रणाली"। पिताजी के आदेश के पीछे कोई बात रही होगी और मैं इसी आलोक में घटना का एक पक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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बिहार के उत्तरी जिलों में काम-काज की रफ़्तार किसी से छुपी नहीं। जितनी धीमी काम की रफ़्तार उतनी ही तर्रार जुबानी शेखी। इलाके की ज्यादातर आबादी गप्पों में ही जीवन बिताती मिलेंगी। जी हाँ, आदि-शंकराचार्य को निरुत्तर कर देने वालों की धरती पर गप्पाड़ों का जमावड़ा है। अब ना तो मेहनतकश किसान, ना ही कीर्तन। सब पैसा हड़पने में जुटे हैं और जो अर्थहीन है वह भाग्यवाद का पंडित।

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15 अगस्त 1947 को कुछ लोग विभाजन और अधिकांश लोग आजादी के दिन के रूप में मनाते हैं …… असली लॉटरी तो लगी उन दोपाया प्राणियों की जिनका जन्म 1942 के पहले हो गया था और तुष्टिकरण की सरकारी नीतियों ने थोक भाव से स्वतंत्रता सेनानी करार दिया। मुफ्त की रेल यात्रा, आजीवन पेंशन इत्यादि का छककर मजा लूटा ऐसे बाबाओं ने जिन्होंने ना तो अंग्रेजों पर 1 ढेला चलाया और ना ही इन्हें किसी अँगरेज़ ने 1 थप्पड़ मारा। बहुत से फर्जी स्वतंत्रता सेनानी अव्वल दर्ज़े के फ़ूहड़ और कइयों ने तो उम्र 15-20 साल बढ़ाकर बताया सुविधाएं डकरने को।
शहर वाले स्वतंत्रता सेनानियों को जितना सम्मान देते हैं, गाँवों में ऐसा नहीं है---- जैसे बुड्ढे, वैसा मान। गंभीर बाबाओं से डरना और हलके  बुड्ढों की खिंचाई। मेरे गृह-जिले के एक गाँव को  पड़ोसी गाँव से एक बरसाती नदी अलग  करती है। आजादी के पहले से पुल की माँग भी थी और दरकार भी। कई दुर्घटनाएँ घटीं ग्रामीणों के साथ नदी पार करते, पर सरकारी बाबूओं की फाइलों में ग्रामीण प्राणों की कोई  कीमत नहीं होती। गाँव में लम्पटों की एक टोली  उपरोक्त श्रेणी के एक बाबा के मजे ले रहा था। "टीवीवाली, अखबारवाली  रहेगा … DM, SP सब रहेगा। आपको कुछ नहीं करना है---- मटिया तेल(*किरोसिन)  डालना है। परशासन अइसे नहीं मानेगा। माचिस जलाते ही हम आपको धर लेंगे। सरकार हिल जायेगा बाबा ……"
इसके बाद जो हुआ वह इतिहास के पन्नों में है। वंशी साह ने तीली जलाई, गाँव के लौंडे फुर्र और चाचा धूं-धूं कर जलने लगे, मिनट में स्वाहा। सिपाही देखते रहे, छोटे-मोटे पत्रकार और ग्रामीण तमाशे के संवेदनहीन मूकदर्शक भी थे और स्क्रिप्टराइटर भी।
कालांतर में "वंशी चाचा के संघर्ष" को ध्यान में रखते हुये पुल का नामाकरण चाचाजी के नाम पर हो गया। ऐसी कहानियाँ हमने बचपन में भी पढ़ी थी--- "अखबार में नाम" .…
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गजेन्द्र सिंह की कहानी अलग थी, भरा-पूरा समृद्ध परिवार। राजनीति के गिद्धों ने उसके महत्वाकांक्षा की बलि ले ली। जितना मनोविज्ञान मुझे पता है, पेड़ पर चढ़े गजेन्द्र के हाव-भाव मृत्युसूचक तो नहीं थे। परिवार के उत्सव और प्यारी सी बिटिया को छोड़कर 400 किलोमीटर की यात्रा आत्महत्या के लिये, वह भी इतने लोगों के बीच, पार्टी का चुनाव चिह्न हाथ में लेकर ----- ना, ना .... गजेन्द्रजी, आपका गणित गलत हो गया। जैसे वंशी चाचा आग के लपटों की रफ़्तार का अंदाज़ा ना लगा सके, आप भी सूती साफ़े की गाँठ और गले की कोमलता ना भाँप सके। तिसपर आपने उन गिद्धों से अपेक्षा रखी कि वे बचाने को आगे आयेंगे जिनका राजनीतिक आहार ही नरबलि है।

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कृपया मुझे ज्ञान देने की गलती ना करें, असहमति वाले कमेंट हटा दिए जायेंगे।

(मृतक के परिवार के साथ मेरी संवेदनाएँ हैं। पोस्ट उनको आहत करने नहीं लिखी है।)

Saturday, April 4, 2015

General Election results (2014)

Written on 16-May 2014

I have witnessed the freedom from Monstrous Congress rule. It started against the dictatorial behaviour of Indira Gandhi in 1975 by denying Democratic rights to People of India.
My father as a 21 year old student activist under guidance of JP was arrested for 19 months.

Pitashree, your political prisoners' pension has attained the real worth today. & I as a fighting son feel like squirrel in Shri Ram's army.

~Feeling emotional.

Friday, April 3, 2015

सुनाम

बैशाखी आनेवाली है, पिछली २ बैशाखी से मैं आपको हुतात्मा ऊधम सिंहजी के 1 ग्रामीण के विषय में बताना चाह रहा था।

२०१२ के अगस्त महीने में मित्र से मिलने मुंबई गया था। वासी से एयरपोर्ट आने के लिए स्टैंड से १ टैक्सी ली। गुरुदयाल नाम था उन टैक्सी चालक का(शायद उस स्टैंड के नेता थे), बड़े ही अनुभवी, मिलनसार और सौम्य।
टैक्सी शुरू होने के पहले ही हमारी बातें चालू हो गयीं। पत्नी ने पिछली सीट पर डेरा जमाया और मैं गुरुदयालजी के बगलवाली सीट पर। स्वभावतः मैंने पूछ लिया, "कहाँ से हैं आप"?

सहजता से जवाब दिया--- "आप नहीं जानते होंगे भाई साहब, छोटी सी जगह है--- संगरूर" …
मैंने उनके चेहरे पर मानो ख़ुशी बरसा दी अपनी प्रतिक्रिया से -------"कैसे नहीं जानूँगा  …… ऊधम सिंहजी का गाँव सुनाम तो संगरूर में ही है ना....."
तपाक से बोले---- "मैं सुनाम से हूँ.…"

हम दोनों के चेहरे पर प्रसन्नता छा गयी। मैं खुश था क्यूंकि मुझे महान क्रांतिकारी के ग्रामीण के दर्शन का सौभाग्य मिला।  वे संतुष्ट थे कि कोई तो है जो ऊधम सिंहजी की बलिदान गाथा जानता है। … सच भी है, हमारे पाठ्यक्रम की पुस्तकों ने सेनानियों का मान नहीं किया। पलक झपकते ही हम वासी और मुंबई के टोल ब्रिज को पार कर रहे थे और इशारों से गुरुदयालजी ने बताया कि बांग्लादेश से आये घुसपैठिये इन जगहों पर ठिकाना लेते हैं फिर झुग्गियों में जाते हैं, कुछ झुग्गियां भी रास्ते से दिखायीं।  ५०(50) के आस-पास उम्र होगी, ३० साल खाड़ी-देशों में क्रेन ऑपरेटर का काम करने के बाद स्वदेश लौटे थे, थोड़ी जमापूँजी और इस्लामिक देश में गैर-मुसलमान की हालत को जेहन में संजोये।

ढ़ेर सारी बातें, मानो हम वर्षों से जानते हों एक-दूसरे को। बातें रह रहकर अवैध घुसपैठ और इसके समूल निराकरण पर आ जाती, उनकी चिन्ता जायज थी। भाजपा को विकल्प के रूप में पूछने पर उनका जवाब था ---"पार्टी और नेता तो औरों से अच्छे है, पर बूढ़े और निष्प्राण हो चुके हैं  " …… बिना किसी अधिकार के मैंने अपनी तरफ से आश्वासन दे दिया-- "दिसंबर का गुजरात चुनाव हो जाने दीजिये, मोदीजी नेता होंगे भाजपा के" …… (गजब सी संतुष्टि दोनों के चेहरे पर)

पहली बार मैं चाह रहा था कि आज एयरपोर्ट थोड़ी दूर खिसक जाये, किसी चौराहे पर बाधा मिल जाये  .... मैं उनके अनुभव सुनता रहूँ। खैर, मैं मंजिल तक आ चुका  था और उन्होंने जोरदार विदाई दी।

बातचीत का ब्यौरा फिर कभी। … फिलहाल आप सुनाम, भाभरा, हुसैनीवाला, खेड, नैहाटी इत्यादि गाँवों  और उनके सपूतों के विषय में पढ़िये ताकि इन पवित्र भूमि से आया कोई बंधू आपसे संकोच ना करे।