ॐ
यद्यपि मुझे कोई सिद्धांत देने का अधिकार प्राप्त नहीं है , परन्तु आज मुझे अपने स्वार्थ्य के लिए कुछ बातें कह लेने दीजिये।
हम भारतवासियों के भाग्य विधाता ने ना कभी हमारे सर्वांगीन हितों की ओर ध्यान दिया था ना अब दे रहे हैं,तो मेरी आकांक्षा उन अधिनायकों की ओर से शून्य हैं। मेरी ये स्वार्थ्यपूर्ण लेखनी केवल कुछ राष्ट्रभक्तों से आश्रय चाहती है। वैसे भी ॐ से शुरुआत की है तो राजनीतिक हिन्दुओं की जरूरत नहीं।
मेरे मन की टीस दिन-ब-दिन मुझे रुलाती है और इससे पहले की मैं अपनी व्यथा-कथा सुना पाऊं ये अधिनायक लोग नई और ज्यादा गहरी पीडा दे देते हैं।
फिलहाल तो आपको पिछले कुछ दिनों की ख़बर सुनाऊँ जो Swine Flu के शिकार हो गए। मेरा मतलब Swine फ्लू ने वैसे तो २३ जानें ही ली है लेकिन जो महत्वपूर्ण समाचार इसकी भेट चढ़ गए वो भरपाई असंभव है। वैसे मैं इतना क्यूँ गंभीर हुआ जा रहा हूँ -- आजकल की लोकप्रिय मीडिया houses ( लोकप्रिय इसलिए कहा क्यूंकि जनता की ये सरकार इन channels पर घोषणाएं करने और साक्षात्कार देने में ज्यादा गर्व महसूस करती हैं) तो जिस ख़बर को चाहें निगल जाएं और जिसे चाहें पर्वत की विराट आकृति दे दें। और फिर करें भी क्यूँ नहीं-- इनके मकसद तो 2 सूत्री है-- मुनाफा कमाना और घृणा फैलाना। अब यदि आप इनके मनसूबे का हिस्सा बन चुके हैं तो आपको Happy Hindu का तमगा देता हूँ।
सिलसिलेवार शुरू करता हूँ -
१) The US Commission on International Religious Freedom (USCIRF) has placed India on its "Watch List" for New Delhi's largely inadequate response in protecting its religious minorities.
क्या ये वही लोग हैं जो surname के आधार पर बदसलूकी करतें हैं, फ़िर वो भले ही कलाम भारतवर्ष का पूर्व राष्ट्रपति ही क्यूँ ना हो और विमानपत्तन नियमों ने छूट दी हो उनकी सेवा के लिए। या फ़िर कमल हासन, जिसके नाम का १ हिस्सा उनके इस्लाम का अनुयायी होने की ओर इशारा करता हो।
खैर, मैं अपनी और अपने देश में minority situation पर थोड़ा बहुत बोल लूँ:
अब मैं हज सब्सिडी,इत्यादि की चर्चा नहीं करूँगा क्यूंकि मक्का की सैर किसी को आतंक की शिक्षा नहीं देती होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं मदरसों की बात भी नहीं करूँगा जो अपने शुद्धतम रूप में इस्लाम की शिक्षा देता है (सामान्य रूप से घृणा और बगावत की, यही वजह है की आज भी मुसलमान हमारे साथ होकर भी हमसे दूर हैं)
-और इसी तर्क से वो राष्ट्रीय उत्सव मनाने से भी बच जाते हैं जो कि शैक्षणिक संस्थानों के लिए अनिवार्य है। हमारी सरकार इन मदरसों के निर्माण तथा यहाँ काम करने वालों के वेतन के लिए बजट का १ बड़ा हिस्सा खर्च करती है।
मैं चर्चा करना चाहूँगा प्रधानमंत्री के उस statement की जो बार बार तुष्टिकरण का शिकार बने हिन्दुओं को उनके अपने ही देश में परायेपन का बोध कराती है - "Muslims have the first right on all the Indian Resources."
2009-10 के बजट में उल्लिखित 890 करोड़ की आवंटित धनराशि यदि मुस्लिम जीवनस्तर को सुधारती है तो मुझे कुछ नहीं कहना लेकिन ये तमाशा वोट-बैंक सलामत रखने के लिए है तो मुझे आपत्ति है. मैं चर्चा करना चाहूँगा मल्लापुरम में अलीगढ मुस्लिम विद्यालय की नई शाखा खोलने के लिए इस वर्ष बजट में आवंटित 25 करोड़ की धनराशि। विभाजन की कहानी किसी भी भारतीय ने चाहे कितनी ही छोटी क्यूँ ना पढ़ी हो, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की भूमिका अवश्य जानता होगा, बशर्ते ना जानने का स्वांग ना करे।
आंध्र प्रदेश की सरकार अतिक्रमण के नाम पर मंदिरों को तो तोड़ पाती है लेकिन चर्च तथा मस्जिदों को छू भी नहीं पाती। भारत सरकार असम में घुसपैठिये बंगलादेशी मुस्लिमों को इसलिए नहीं भगाती क्यूंकि वे potential Vote bank हैं कांग्रेस पार्टी के लिए.
सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सज़ा सुनाये जाने के बावजूद सरकार अफजल गुरु को फांसी पर नहीं चढाती क्यूंकि ऐसा करने से उन्हें अपना वोट बैंक खिसकता नज़र आता है। वही दूसरी ओर एक साध्वी को आतंकवाद के आरोप में फटाफट गिरफ्तार कर वो सब कुछ किया जाता है जो भारतवर्ष ने किसी घृणित अपराध के लिए भी किसी के साथ कभी नहीं किया। मोकोका का कानून लगाकर भी केस नहीं बना पाये और न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया तो नई कहानी बनाने में लगे हैं। वो सब केवल एक तुच्छ उद्देश्य से- भगवा आतंकवाद / हिंदू आतंकवाद नाम से एक शब्द बाज़ार में लॉन्च करने के लिए। मैं पूछता हूँ - आजतक जितने अपराधियों पर आतंकवाद का आरोप सिद्ध हुआ है सब के सब मुसलमान हैं , कभी मीडिया ने इस्लामिक आतंकवाद इस्तेमाल किया क्या?तब तो हम अच्छे नागरिक बन जाते हैं आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता & ब्लाह ब्लाह ।
मुझे जवाब चाहिए केन्द्र सरकार के उस बन्दर छाप मंत्री से जो भारतमाता तथा अन्य हिंदू देवी देवताओं की नग्न तस्वीर उकेरने वाले विकृत मानसिकता वाले पागल मकबूल फ़िदा हुसैन के लिए भारतरत्न की मांग करता है।
ये बन्दर छाप मंत्री UN एवं अन्य स्थानों पर भारत का प्रतिनिधित्व तो ठीक से कर नहीं सका अब विदेश मंत्रालय में उधम मचा रहा है।
मुझे जवाब चाहिए महाराष्ट्र के गृहमंत्री पाटिल से, जिसने आज कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर Russian Belly Dancers तथा cheerleaders को पूजा प्रांगन में नचवाया और देश के 80 करोड़ हिन्दुओं को उनकी हद बताते हुए संदेश दिया- हम तो ऐसा ही करते रहेंगे,तुम क्या कर लोगे? कोई मुझे याद दिलाये कभी इफ्तार की पार्टी किसी नेता ने दी हो और ये बदतमीजी दिखाई हो। वैसे भाइयों याद दिला दूँ , ये पहली घटना नहीं है इस प्रकार की। मेरी जानकारी में कोई ५ साल पहले पटना में माँ दुर्गा को जींस पैंट पहनाया गया था और बेहूदगी से तर्क ये दिया गया की आधुनिक युग है।
तो, मैं आज बात कर रहा हूँ Religious Minorities के हालत पर,आप सोच रहे होंगे भारतवर्ष में बहुत सारे अल्पसंख्यक हैं तो फिर मैं १ पंथ विशेष को क्यूँ टारगेट कर रहा हूँ तो दोस्तों, मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं और मैं आपको अगले संस्करण में विस्तार से बताऊंगा
फिलहाल,ईसाईयों की हालत का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है की भारत की सर्वाधिक गैर-कृषियोग्य ज़मीन के मालिक कैथोलिक चर्च हैं और इन्हे अपने आय-व्यय का कोई हिसाब नहीं देना होता। सेवा-कार्य की आड़ में धड़ल्ले से धर्मान्तरण करते हैं और कोई स्थानीय यदि विरोध करे तो फिर मानवाधिकार,सरकार,अन्तर राष्ट्रिय संस्थाएं तो हैं ही झंडा खड़ा करने के लिए की बहुत अत्याचार हो रहा है निरीह पादरी के ऊपर। वही संघ के स्वयंसेवक निःस्वार्थ भाव से कोई सेवा कार्य करें तो भगवा ब्रिगेड हिंदुस्तान का भगवाकरण करता दीखता है।
मैंने जब कक्षा 8 में इतिहास पढ़ी थी तब तो गुप्त काल को स्वर्ण युग कहा जाता था, आजकल के छात्रों को मुग़ल काल की गाथा सुनाई जाती है तथा शिवाजी महाराज को हिन्दवी साम्राज्य की स्थापना के जुर्म में जितना संभव हो इतिहास की पुस्तक से दूर रखा जाता है।
दोस्तों, यदि आपके चक्षुओं से भी नींद चली जाती है ये बातें सोचते सोचते तो आप भी मेरी तरह हतास हिंदू हैं, और इस हतासा का हल भी निकालना होगा,हमें ही और अभी ही।
स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर हमें आत्म मंथन करना होगा -हुतात्माओं ने जिस स्वाधीनता के लिए अपने आप को कुर्बान कर दिया वो ऐसी ही होनी चाहिए या हमें गर्वान्वित हिंदू की भांति जीने के लिए एक और आन्दोलन की आवश्यकता है।
वंदे मातरम
Friday, August 14, 2009
Wednesday, August 5, 2009
त्यागीजी के ब्लॉग की प्रतिक्रिया
शर्मिंदा तो मैं भी हूँ, शर्मिंदगी इस बात की भी है की शर्मिंदा होने के लिए आपका ब्लॉग पढना पड़ा, अखबारों ने तो इस समाचार को जगह भी नहीं दी हमारे यहाँ.
अब जो बदनामी मीडिया ने हमे तोहफे(तोहफा इस लिए कहा क्यूंकि शायद ये कुछ रक्त में उबाल ला सकी है) में दी थी उसके लिए कभी माफ़ी मांगेंगे ये सेंसेशन के ठेकेदार...!!!
१०० करोड़ हिन्दुओं को एक ही झटके में बदनाम करने हेतु ये ऊटपटांग बकबक करने वाले गेहुये चमरी वाले अँगरेज़ पत्रकार कभी माफ़ी मांगेंगे..
हे देवी, हम तुझमे शक्ति और सहिष्णुता का अद्भुत मिश्रण देखते हैं. ये शक्ति परमात्मा से मांगता हूँ की तेरे हर चोट का उचित प्रतिकार ले सकूँ.
शशि थरूर को मकबूल हुसैन की विकृत मानसिकता तथा चित्रकारी के लिए भारतरत्न सुझाते शर्म नहीं आती..
या कहीं ऐसा तो नहीं कि अब केवल हिन्दू भावनाओं को चोट पहुचने के लिए भारतरत्न दिए जायेंगे.हमारी संस्कृति ने कला को महत्वपूर्ण स्थान दिया है जो हमारे समाज में कुछ दशक पूर्व तक पाया जाता था...लेकिन इस मंत्री की आश्रयदाता पार्टी ने कभी इस कला को बढ़ावा नहीं दिया और आज मधुबनी चित्रकारी मरनासन स्थिति में है.
शायद मुझे कला कि उतनी परख नहीं जितनी की इन मंत्रियों को है. मकबूल हुसैन की टेढी-मेढी रेखाएं मुझे उसके अंदर के खालीपन के अलावा कुछ नहीं सुझाती और इस बंदर छाप मंत्री को देखिये -कितना कुछ पढ़ लिया इसने.
वैसे तो इन शिशुपालों ने अपनी गलतियों की सीमा पार कर ली है,अब देखना ये है की सुदर्शन चक्र कब आता है.
अब जो बदनामी मीडिया ने हमे तोहफे(तोहफा इस लिए कहा क्यूंकि शायद ये कुछ रक्त में उबाल ला सकी है) में दी थी उसके लिए कभी माफ़ी मांगेंगे ये सेंसेशन के ठेकेदार...!!!
१०० करोड़ हिन्दुओं को एक ही झटके में बदनाम करने हेतु ये ऊटपटांग बकबक करने वाले गेहुये चमरी वाले अँगरेज़ पत्रकार कभी माफ़ी मांगेंगे..
हे देवी, हम तुझमे शक्ति और सहिष्णुता का अद्भुत मिश्रण देखते हैं. ये शक्ति परमात्मा से मांगता हूँ की तेरे हर चोट का उचित प्रतिकार ले सकूँ.
शशि थरूर को मकबूल हुसैन की विकृत मानसिकता तथा चित्रकारी के लिए भारतरत्न सुझाते शर्म नहीं आती..
या कहीं ऐसा तो नहीं कि अब केवल हिन्दू भावनाओं को चोट पहुचने के लिए भारतरत्न दिए जायेंगे.हमारी संस्कृति ने कला को महत्वपूर्ण स्थान दिया है जो हमारे समाज में कुछ दशक पूर्व तक पाया जाता था...लेकिन इस मंत्री की आश्रयदाता पार्टी ने कभी इस कला को बढ़ावा नहीं दिया और आज मधुबनी चित्रकारी मरनासन स्थिति में है.
शायद मुझे कला कि उतनी परख नहीं जितनी की इन मंत्रियों को है. मकबूल हुसैन की टेढी-मेढी रेखाएं मुझे उसके अंदर के खालीपन के अलावा कुछ नहीं सुझाती और इस बंदर छाप मंत्री को देखिये -कितना कुछ पढ़ लिया इसने.
वैसे तो इन शिशुपालों ने अपनी गलतियों की सीमा पार कर ली है,अब देखना ये है की सुदर्शन चक्र कब आता है.
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