नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनाव का प्रचार अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज़ पर किया। कुछ लोगों ने इसकी निंदा की और कईयों को यह बहुत पसंद आया क्योंकि हम भारतवासी 20-25 प्रधानमंत्री उम्मीदवारों से तंग आ गये थे। गिनती के पचास बुद्धुजीवियों को छोड़ दें तो सभी ने मोदीजी के शासन को भ्रष्टाचार मुक्त और न्यायसंगत माना है। प्रधानमंत्री बनने के बाद इन्होंने अथक और अनवरत काम किया है और जब भी भाषण/दर्शन का सौभाग्य मिला, यही लगा कि भारतमाता का सच्चा सपूत कहलाने मात्र की प्रेरणा से आप अप्रतिम कार्य कर सकते हैं।
परन्तु मेरे देश में एक रोंदू वर्ग है, और मैं यह विशेषण इसलिये नहीं दे रहा हूँ क्योंकि उन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया या वोट देकर भी दिन-रात गाली देता है। बल्कि इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उन्हें लगता है कि 5 साल में एक बार वोट देकर(या ना देकर) उन्होंने बहुत बड़ा एहसान कर दिया है देश पर {ये लोग टैक्स डर के मारे देते हैं और जब मौका लगे चुराते भी हैं}, अब सभी बातों के लिये सरकार की जिम्मेदारी ... ये इतने निराशावादी हैं कि हर तीसरे लाइन के बाद कहेंगे----"कुछ नहीं होगा यहाँ"... जब किसी अच्छी सरकारी नीति के बारे में बताइये तब अर्द्धदार्शनिक मुद्रा में कहेंगे ---"सब पार्टी एक जैसा है"... इतनी नकारात्मकता है इनके भीतर कि बात शुरू कीजिये अन्तर्राष्ट्रीय रिश्तों से, तो ये ख़त्म करेंगे संसद कैंटीन की सब्सिडी पर.... और जब बताइये कि भाई सब्सिडी तो ख़त्म हो गयी तब पहुँच जायेंगे ----"जेटली को वित्त मंत्री क्यों बनाया"...... भाई, 10 साल प्रधानमंत्री राज्यसभा का था तब ठीक था और कोई पहली बार राज्यसभा से तो मंत्री बना नहीं है और भाजपा ने तो संसद के दो सदन बनाये नहीं हैं...... "सब पार्टी एक जैसा है" .... NOTA को वोट दूँगा मैं तो(नया फैशन).... भाजपा में 500 वें नंबर का कोई साक्षी महाराज या साध्वी प्राची कोई बयान दे तो बहस करने आ जायेंगे------ खैर इन चर्चाओं में सैकड़ों घंटे बर्बाद करता हूँ और करता रहूँगा।
आज का मुद्दा है इन रोंदूओं के अमरीका में बसने की अभिलाषा के मुद्दे पर। उपरोक्त विशेषता वाले अधिकांश लोगों को लगता है कि भारत से बेकार कोई देश नहीं और अमरीका का वीज़ा लग जाये तो जीवन सफल। अमरीका में लम्बे समय तक यूरोपीय सजायाफ्ता अपराधियों का वास था और उसके बाद जब गोरों ने इस भूभाग को अथाह संसाधनों वाला पाया तब नियम-कानून की सख़्ती प्रारंभ की। आज भी बहुत से राज्यों के कानून अपरिपक्व हैं, परन्तु अच्छी बात यह है कि कानून-व्यवस्था सख्त है। भारत कम से कम 8 सहस्राब्दियों तक मुख्यतया मूल्यों वाला देश रहा है और समाज के लोग मूल्यों/लोकलाज के कारण शान्तिपूर्वक रहे, कानून की उतनी आवश्यकता नहीं आयी। हालाँकि बदलते परिवेश में समय आ गया है कि हम नये देशों से कानून की सख्ती की सीख लें।
अमरीका में चुनाव का समय चल रहा है, अरबों डॉलर के खर्चे से यह दुनिया का सबसे महँगा राष्ट्रपति चुनाव होता है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रोटेस्टैंट ईसाई हैं चर्च गवर्नमेंट समूह के, इनके ऊपर नस्लीय भेदभाव के आरोप आम बात है। भारतीय मीडिया पेरिस हमले के बाद मुसलमानों को लेकर ट्रम्प द्वारा दिये बयान पर चर्चा कर चुकी है और चर्चाओं में इन्हें विलेन के तौर पर दिखाया गया है। सच्चाई यह है कि आये दिन ये विवादित बयान देते रहते हैं सभी Non-White क्रिस्चियन नस्लों के खिलाफ, जिससे ना इनके कोर वोट बैंक White Christian में कोई फर्क पड़ता है और ना इनके व्यापार में। एक और बात, यह अपना लम्बा-लम्बा विवादित बयान तैयार करके लाते हैं---कभी सफाई भी नहीं देते और माफ़ी का तो सवाल ही नहीं। ताजा मामला इनके ऊपर चल रहे धोखाधड़ी के मामले का है। जज ने आरोप सही ठहराये तो बकायदा बयान जारी कर दिया कि जज मेक्सिको मूल का है और नस्लीय आधार पर पूर्वाग्रह से ग्रसित है। एक बार नहीं, बार-बार कहा ... और हाँ, यह शख्स रिपब्लिकन पार्टी के 500वें नंबर का नहीं, राष्ट्रपति उम्मीदवार है।
रोंदू अब भी कहेंगे, कुछ भी कह लो अमरीका इज़ ग्रेट .... बीजेपी मुसलमान विरोधी है ... मेरे 15 लाख दो .... प्याज कितना महँगा है ...
By the way, आज एक विज्ञापन देखा कि मुंबई में Lodha estate और ट्रम्प मिलकर आवासीय Trump Tower ला रहे हैं, (कीमत 9 करोड़++)