शर्मिंदा तो मैं भी हूँ, शर्मिंदगी इस बात की भी है की शर्मिंदा होने के लिए आपका ब्लॉग पढना पड़ा, अखबारों ने तो इस समाचार को जगह भी नहीं दी हमारे यहाँ.
अब जो बदनामी मीडिया ने हमे तोहफे(तोहफा इस लिए कहा क्यूंकि शायद ये कुछ रक्त में उबाल ला सकी है) में दी थी उसके लिए कभी माफ़ी मांगेंगे ये सेंसेशन के ठेकेदार...!!!
१०० करोड़ हिन्दुओं को एक ही झटके में बदनाम करने हेतु ये ऊटपटांग बकबक करने वाले गेहुये चमरी वाले अँगरेज़ पत्रकार कभी माफ़ी मांगेंगे..
हे देवी, हम तुझमे शक्ति और सहिष्णुता का अद्भुत मिश्रण देखते हैं. ये शक्ति परमात्मा से मांगता हूँ की तेरे हर चोट का उचित प्रतिकार ले सकूँ.
शशि थरूर को मकबूल हुसैन की विकृत मानसिकता तथा चित्रकारी के लिए भारतरत्न सुझाते शर्म नहीं आती..
या कहीं ऐसा तो नहीं कि अब केवल हिन्दू भावनाओं को चोट पहुचने के लिए भारतरत्न दिए जायेंगे.हमारी संस्कृति ने कला को महत्वपूर्ण स्थान दिया है जो हमारे समाज में कुछ दशक पूर्व तक पाया जाता था...लेकिन इस मंत्री की आश्रयदाता पार्टी ने कभी इस कला को बढ़ावा नहीं दिया और आज मधुबनी चित्रकारी मरनासन स्थिति में है.
शायद मुझे कला कि उतनी परख नहीं जितनी की इन मंत्रियों को है. मकबूल हुसैन की टेढी-मेढी रेखाएं मुझे उसके अंदर के खालीपन के अलावा कुछ नहीं सुझाती और इस बंदर छाप मंत्री को देखिये -कितना कुछ पढ़ लिया इसने.
वैसे तो इन शिशुपालों ने अपनी गलतियों की सीमा पार कर ली है,अब देखना ये है की सुदर्शन चक्र कब आता है.
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