Thursday, January 20, 2011

हमारी दरिद्रता के कारक




मित्रों,

इन दिनों समाचार-माध्यम बड़ी जिम्मेदारी से अपना काम कर रहे हैं: ढेर सारी खबरें दे जाते हैं।

सुबह आँखें खुलते ही 60 पृष्ठ का Times of India हाथ लगता है (ये बात और है कि कुछ तो पलटने की भी ज़रुरत नहीं होती ) --> Headlines में भी ताजगी होती है ।

शाम को Times Now पर श्रीमान गोस्वामी २ घंटे तक डटे रहते हैं छड़ी लेकर (वैसे पिटाई करते समय थोड़े पक्षपाती हो जाते हैं) सच उगलवाते हैं। वैसे देशहित में चौपाल लगाने वाले ऐसे अनेकानेक महानुभाव हैं। फिर अंतरताने पर हर click के साथ नयी खबरें flash होती ही रहती है।

अब आप जानना चाहेंगे इनके जिम्मेदारीपूर्वक समाचार प्रसारित करने से मुझे इर्ष्य क्यूँ होती है, तो कुछ मुख्य कारण बताता चलूँ:

१) भ्रष्टाचार की तलाश में इनके खोजी कुत्ते इतने फुर्तीले हैं कि मैंने एक घोटाले पर चिटठा शुरू ना किया तबतक ये उससे बड़े कि रिपोर्टिंग कर देते हैं। स्वभाव से तो मैं भी छुद्र हूँ- Blogging में प्रवेश तो धमाकेदार होनी ही चाहिए



२) मैं भी आम आदमी की भांति आदतन भुलक्कड़ , सहनशील, आलसी (आरामप्रिय) और निराशावादी हूँ, अब आप समझ गए होंगे कि मैंने शुरुआत समाचार माध्यमों कि सराहना से क्यूँ की।

बहरहाल जिन समाचारों ने मुझे आज बाध्य किया उन पर तनिक प्रकाश डाल लेने दीजिये-

Peepli Live के Oscar से बाहर होने का समाचार flash हो रहा था व स्विस बैंक में जमा काले धन को वापस लाने की बहस जारी थी......



मेरे प्यारे भारतवर्ष में बेहयाई बेचने का नया फैशन चल निकला है पिछले कुछ वर्षों से।

इस व्यापार में आम आदमी (इस बजट के मुताबिक़ मैं इस श्रेणी में नहीं हूँ) की सरकार के मुखिया समेत अन्य नेताओं के अलावा विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियाँ शामिल हैं । २ साल पहले भारत की झुग्गी-बस्तियों पर आधारित फिल्म Slumdog Millionaire बनाकर चर्चित हुए कुछ अन्यथा अनजान नाम भी इस बेहयाई-बेचो कार्यक्रम का हिस्सा बने। याद दिला दूं कि इस चलचित्र के निर्माता- निर्देशक एक British नागरिक हैं भारत की गरीबी का मखौल बनाने के सिवा इसमें कुछ भी नहीं।

बताने की आवश्यकता नहीं, कि अपने देश में भी इस चलचित्र को अत्यधिक पसंद किया गया, इस तर्क से की विदेशियों का निर्देशन तो देखो: हमारे फिल्मकार सात जनम में ऐसी फिल्में ना बना सकें। फिल्म को Oscar पुरस्कार मिला तथा कलाकारों को सूट एवं विदेश जाने का मौका।



मैं खून के आंसू रोता रहा कि तभी UPA-2 ने अपने लिए 100 दिनों का लक्ष्य बताते हुए घोषणा-वाचन समारोह आयोजित किया और 100 दिन में पूरे देश से झुग्गी-बस्ती हटाने तथा पुनर्वास की बात की।

भाजपा की हार से तो मायूस था, लेकिन इस खबर के बाद एक चहक आ गयी। राहुल G तक को चुनौती दे डाली मन ही मन में - अब देखता हूँ कैसे लाते हो Milliband सरीखे भारत-विरोधियों को झुग्गी- पर्यटन कराने, Danny Boyle जैसे मच्छरों की क्या औकात।



Peepli Live के जरिये Oscar लाने की कवायद शुरू हुयी तो ऐसा लगा जैसे किसी पाठ का पुनाराभ्यास कर रहा हूँ। किसानों का मजदूरी की ओर पलायन, क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या : यह एक करारा तमाचा है हम तथाकथित सभ्य समाज पर जो दंभ भरते हैं अपने तेज़ आर्थिक विकास दर का। यह एक कडवी सच्चाई है उस कृषि मंत्रालय की जानकारी के लिए जहां से किसानों के हित की एक भी खबर ना सुनने को मिली ना कार्यान्वित हुयी।



चंद गद्दारों ने स्विस बैंकों में देश की जनता का पैसा छिपा रखा है, और हमारे ईमानदार प्रधानमन्त्री देश के सर्वोच्च न्यायालय को कहते हैं कि इन चोरों की सूची सार्वजनिक नहीं की जा सकती। ध्यान देने की बात ये है, कि

यह सूची जर्मनी ने भारत सरकार को इस आधार पर दी है की कहीं इनमे टैक्स-चोरी तो नहीं हुयी।



स्विस सरकार का आर्थिक गोपनीयता कानून आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए नहीं है, ख़ास कर आज के समय में जब हर ज़िम्मेदार राष्ट्र आतंकवाद के खिलाफ एकजूट है और ऐसे कानून की आड़ में आतंकी संगठनों की funding होती है। यदि भारत सरकार देश में एक अधिसूचना जारी कर दे जिस व्यक्ति या ट्रस्ट का स्विस खाता है- अपने आय व्यय की जानकारी दें अन्यथा भारत की संसद क़ानून बनाकर उन बैंकों में संचित धन को जनता से चोरी किया गया घोषित कर देगी और अधिग्रहण कर लेगी।

अगले कदम के तौर पर स्विस सरकार पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर पैसा वापस लाने का प्रयास करे, तब संभव है हमारी आने वाली पीढ़ी को Slumdog की शर्मिंदगी ना झेलनी पड़े, किसानों को इतना सम्मान मिले कि Peepli Live का ख़याल भी ना आये।

मैंने यथार्थ के निकट कि बातें तो बताई नहीं--- हमारी सरकार ने स्विस सरकार से भारतीयों के जमा हुए धन को Money Laundering तो क्या Tax-evasion के लिए भी पहल नहीं की। तब भी नहीं जब अमेरिका ने स्विस सरकार और आर्थिक गोपनीयता कानून की कान ऐंठते हुए अपने भ्रष्ट नागरिकों की सूची निकलवाई।
हमारा रवैया तो ऐसा होता है कि हसन अली (एक चेहरा जो स्विट्जर्लैंड के खातों के लेन-देन का जरिया है) जिसने 70,000 करोड़ कि तस्करी का संगीन जुर्म किया, पकडे जाने पर मुकदमा चलता है २ पासपोर्ट रखने का (ये तो हमारे २-G भी रखते हैं).
अप्रत्याशित तो नहीं लगता क्यूँकि जिनको कार्यवाही करनी चाहिए उनके ही तो ये proxy हैं.

मित्रों,
यदि आप इस भ्रम को पाल बैठे हैं कि सरकार ईमानदारीपूर्वक आपके चोरी हुए पैसे को वापस लाकर देगी तो याद दिला दूं, कांग्रेस के दिवंगत मिस्टर फोटोजेनिक के खाते कि लगभग पुष्टि हो चुकी है. तो आप सरकार में बैठे अपने प्रतिनिधियों की मजबूरी समझिये.


आपका पैसा है तो लाने की जुगत तो आपको ही करनी होगी: मेरा काम तो जागना और जगाना है.
भुलक्कड़पन का रोग लगा है तो ये डकैत फिर लूटेंगे, फिर सत्ता पर कब्ज़ा जमायेंगे और हसेंगे आपकी गरीबी पर, चलचित्र बनायेंगे माँ भारती की दरिद्र अवस्था पर, अपने विदेशी मित्रों को झुग्गी- पर्यटन करवाएंगे।


अब जागना होगा.

इति (4 :55 AM)

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